आत्मस्वीकृति

यह हम सभी का अनुभव है कि लोग प्रायः बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं, किन्तु उनका आचरण तदनुरूप नहीं होता। सिद्धांतों की बातें करना, आदर्शों की चर्चा करना आदि कुछ लोगों का स्वभाव-सा हो चला है; किन्तु उनके आचरण का यदि विश्लेषण किया जाए तो प्रायः निराशा ही हाथ लगती है।
मैं स्वयं के बारे में भी विश्लेषण करता हूँ तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि मैं जितनी भी ज्ञान की अथवा आदर्शों की बातें कहता और लिखता हूँ, उनमें से अधिकांश मेरे आचरण में परिलक्षित नहीं होतीं। कभी-कभी तो मेरा आचरण मेरी अपनी बुद्धि के ही विपरीत मूर्खता का परिचय दे देता है।
किन्तु सूक्ष्मता से विचारने पर यह मुझे भासता है कि मेरा वह विपरीत आचरण सुविचारित न होकर मनोवेगजन्य होता है। जिस समय मनोवेग अपने चरम पर होता है, उस समय मेरा नियंत्रण स्वयं पर नहीं रह पाता और मैं उच्छृंखल हो उठता हूँ। मनोवेग के क्षीण होते ही मैं पुनः अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आता हूँ—किन्तु पश्चात्ताप के साथ।
शास्त्र में ठीक ही कहा गया है—
“ज्ञानं भारः क्रिया विना।”
Wisdom unreflected through conduct is merely a load.
किन्तु एक चीज़ जो मुझे लगता है कि मेरे हृदय एवं अन्तःस्थल में असामान्य रूप से उपस्थित है, वह यह है कि मैं उन बुरे विचारों को—जो कभी-कभी इच्छा, द्वेष, लोभ,काम एवं अहंकार के कारण मेरे भीतर उत्पन्न होते हैं—अपने भीतर से निकाल देना चाहता हूँ।
परन्तु उनसे जो क्रिया उत्पन्न हो जाती है, उस पर मेरा नियंत्रण तत्समय नहीं रह पाता है। मैं उन विचारों जिससे मेरे से जो निन्दनीय व्यवहार बन जाता है को मैं जड़  से उखाड़ फेंकना चाहता हूँ, किन्तु उनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें मूलतः नष्ट कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं रह गया है।
अब मेरी शक्ति तो जवाब दे गयी है।
बस, अब प्रभु से प्रार्थना ही इसका एकमात्र उपाय है।
— R.R.P.

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