भेद और भगवान
भेद और भगवान
भेद करना भगवान का कार्य नहीं है। भेद-बुद्धि तो उनमें है ही नहीं। इसीलिए तो उन्हें 'सुहृदं सर्वभूतानां' कहा गया है, कहा क्या गया है वे तो स्वयं गीता में इसकी घोषणा किए हैं। जगत में जो भी भेद दिखाई देता है अथवा जो भी विषमता है, वह प्रकृति, गुण और कर्मजन्य है अथवा वर्तमान में उद्योग-भेद से उत्पन्न है; उसमें भगवान का कोई आग्रह नहीं है।
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जिस प्रकार माता-पिता अपनी संतान में भेद-बुद्धि नहीं रखते, बावजूद इसके कि उनकी सभी संतानें अपने पूर्वजन्म-कृत कर्मों के फल अथवा वर्तमान में अपनी रुचि एवं क्षमतानुसार भिन्न-भिन्न स्वभाव और कर्म करने वाली हो सकती हैं, उसी तरह इस जगत में प्रत्येक जीव का शारीरिक, बौद्धिक एवं स्वाभाविक श्रेष्ठत्व या न्यूनता एक-दूसरे से भिन्न हो सकती है। भगवान के साक्षात् इस भेद में कोई विशेष महत्व नहीं है, क्योंकि भगवान ही जगत के माता-पिता हैं।
लेकिन जिस प्रकार संतानों में अपने माता-पिता के प्रति अलग-अलग भावना होती है।
किसी को लगता है कि उनके मां-बाप ने उनके लिए कुछ नहीं किया तो किसी को यह लगता है कि उसके माता-पिता ने उन्हें जन्म देकर कोई उपकार नहीं किया बल्कि संघर्ष करने के लिए बेवजह दुनिया में लेकर चले आए इत्यादि इत्यादि उसी प्रकार मनुष्यों में भी भगवान के प्रति अलग-अलग भावना और धारणा होती है। कोई अपनी अवस्था के लिए भगवान को दोष देता है तो कोई सुदृढ़ परिस्थितियों के लिए उनका गुणगान करता है अथवा उन्हें धन्यवाद देता है। अर्थात्, जिस प्रकार सभी अपने-अपने स्वभाव एवं बुद्धि के अनुसार ही अपने माता-पिता से व्यवहार करते हैं; उसी प्रकार ईश्वर के प्रति भी उनकी भावना भिन्न-भिन्न होती है। परन्तु सांसारिक माता पिता को तो इससे फर्क पड़ भी सकता है जगत के माता-पिता को कदापि नहीं.
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किंतु यह कहना कि सांसारिक माता-पिता अपनी संतान के प्रति भेद-बुद्धि से पूर्णतः मुक्त होते हैं, सर्वथा गलत है। वास्तव में ऐसी बात होती नहीं है.
सांसारिक माता-पिता अपने संतानों में भेद बुद्धि रखता है.
यह भेद आज भी समाज के बहुत-से हिस्सों में दिखाई देता है और बहुत ही सूक्ष्म तरीकों से भारतीय समाज में विद्यमान है।
क्यों भारतीय समाज ने बेटी को वह व्यवहार एवं प्यार नहीं दिया जिसकी वह जन्म से ही हकदार है? यद्यपि अब बहुत-से परिवारों में यह स्थिति बदल रही है, फिर भी आज भी कुछ परिवारों में पुत्र-जन्म को पुत्री-जन्म की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है। कहीं पुत्र को प्राथमिकता दी जाती है, कहीं बेटी के जन्म को लेकर निराशा व्यक्त की जाती है और कहीं तो by default पुत्र को परिवार का उत्तराधिकारी मान लिया जाता है।
जबकि यदि पुत्र और पुत्री दोनों हमारे ही अंश हैं, तो उनके प्रति हमारी दृष्टि में यह अंतर क्यों?
यदि हम भगवान को जगत का माता-पिता मानकर उनसे निष्पक्षता की अपेक्षा करते हैं, तो क्या हमें स्वयं अपनी संतान के प्रति निष्पक्ष होने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
शायद प्रश्न केवल यह नहीं है कि भगवान मनुष्यों में भेद क्यों होने देते हैं; असली प्रश्न यह भी है कि मनुष्य स्वयं मनुष्यों में भेद क्यों करता है।
और शायद यहीं से भेद और भगवान के बीच का वास्तविक संबंध समझ में आता है।
~राजीव रंजन प्रभाकर
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