विजयादशमी के अवसर पर एक विचार
विजयादशमी के अवसर पर एक विचार श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड के एक प्रसंग के आलोक में 20 अक्टूबर 2026 — विजयादशमी विजयादशमी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की रावण पर विजय का पर्व है। सामान्यतः इसे धर्म की अधर्म पर, सदाचार की दुराचार पर और सद्गुणों की दुर्गुणों पर विजय के रूप में देखा जाता है। किंतु इस अवसर पर श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड में वर्णित राम–रावण संवाद का एक प्रसंग मनुष्य के व्यक्तित्व, उसके अहंकार और उसके कथन-कर्म के संबंध में विचार करने को प्रेरित करता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इस प्रसंग में रावण की आत्मप्रशंसा के प्रत्युत्तर में श्रीराम के मुख से पुरुषों की तीन प्रवृत्तियों का बड़ा ही रोचक विवेचन कराया है। उस प्रसंग को अपने शब्दों में प्रस्तुत करने का यह प्रयास है। युद्धभूमि में रावण का अट्टहास युद्धभूमि में श्रीराम के हाथों अपने अनेक वीर योद्धाओं, भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद को खो चुका रावण क्रोध से भरा हुआ श्रीराम के सम्मुख आता है। वह अपने पराक्रम और प्रभुत्व का बखान करते हुए कहता है— रावण: हे तपस्वी! तुमने खर-दूषण, विराध और बाली का वध किया। मेरे असंख्य वीर राक्षसों क...