युद्ध की विभीषिका
आज विश्व में सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है. अमरीका ईरान से तो कहीं रूस यूक्रेन से तो कहीं इजरायल फिलीस्तीन से तो कहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान से लड़े जा रहा है,लड़े जा रहा है. कितनी जानें जा चुकी हैं, कितने हीं आवासीय घर नष्ट हुए जा रहे हैं, कितने हीं सैनिकों के प्राण जा रहे हैं; पर इससे किसी को क्या मतलब! ये तो हुई शासनाध्यक्षों/राष्ट्राध्यक्षों के बीच अहं के टकराव से उत्पन्न युद्ध की स्थिति; इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के आतंकवादी संगठन सहित कई non-state actors भी अपने-अपने तरीके से कुत्सित उद्देश्य के अधीन अपनी बर्बरता एवं हिंसकता से मानवता को परास्त करने पर आमादा हैं. अलावे इसके पता नहीं और भी कितने जगह तरह-तरह के संघर्ष चल रहे हैं. सारांश यही कि सभी एक दूसरे के स्वत्व,साधन और संसाधन को कब्जाने के लिए कुछ भी करने को उद्यत हैं. इस उद्योग में आणविक अस्त्र के प्रयोग की धमकी भी शामिल है. लालच की पराकाष्ठा, द्वेष,नफ़रत एवं बदले की आग में सुलगकर इसकी कोई गारंटी नहीं कि इन आणविक अस्त्रों के प्रयोग की धमकी मात्र धमकी तक हीं सीमित रहे. ...