स्वयं हीं शिल्प स्वयं हीं शिल्पकार स्वयं हीं औजार
मैं स्वयं हीं शिल्प तथा स्वयं हीं शिल्पकार हूॅं और हाॅं; ये भी कि मैं स्वयं हीं छेनी-औजार हूॅं एक ऐसा अप्रमाणित शिल्पकार जिसे प्राप्त है न कोई शिक्षण,न कोई प्रशिक्षण न कोई संरक्षण,न कोई आरक्षण सो शिल्प में जो कमी होनी थी सो है; ***** क्योंकि शिल्प में कमी का कारण भी कोई और नहीं यह शिल्पकार हीं है. और कमी ढूंढकर सुधारने की जिम्मेदारी भी इसी शिल्पकार की है. ************************** एक बात और जो कहना ज़रूरी है वो ये कि--- 'आम ज़िंदगी भी जंग से कोई कम नहीं ताहम जंग ए ज़िंदगी में मै ख़ुद हीं ढ़ाल और ख़ुद हीं तलवार हूॅं. ~राजीव रंजन प्रभाकर