हरिहर वंदना
हे हरे! हे हर! कोऽन्योऽस्ति भवन्तौ सदृशम्? भवन्तौ संचालकौ अखिलब्रह्माण्डम् परन्तु स्वयं स्थ: श्रियागिरिजया संचालितम् लोकवेदप्रतिष्ठाचसाध्यन्ते भवतो: स्मरण् भवन्तौ हि स्वामि-सेवक-सखा परस्परम् तत्वत: वै भवन्तौ परस्परैकम् अज्ञानेन भासते भवन्तौ परस्पर भिन्नम् संसारतापतप्तत्रस्तःअहम् भवतो: सेवकम् कदा सुखी भविष्यति भवन्तौ भजनम्? हे हरिहरम्! भवतो: चरणेषु करोमि आत्मार्पितम्। (स्वरचित) ~ राजीव रंजन प्रभाकरः ********************************* हे हरि! हे हर! आप दोनों के जैसा दूसरा कौन है? आप दोनों हीं अखिल ब्रह्माण्ड के संचालक हो परन्तु स्वयं दोनों ही श्री एवं गिरिजा से संचालित हैं. लोक वेद में प्रतिष्ठा आप दोनों से ही सधते हैं.आप दोनों एक साथ हीं एक दूसरे के स्वामी सखा और सेवक हैं. तत्वत: निस्संदेह आप दोनों एक ही हैं. अज्ञानतावश हीं आप दोनों एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं. संसार ताप से तप्त-त्रस्त आपका ये सेवक आपको भजते हुए कब सुखी होगा? हे हरिहर! आपके चरणों मैं स्वयं को अर्पित करता हूॅं।