भेद और भगवान
भेद और भगवान भेद करना भगवान का कार्य नहीं है। भेद-बुद्धि तो उनमें है ही नहीं। इसीलिए तो उन्हें 'सुहृदं सर्वभूतानां' कहा गया है, कहा क्या गया है वे तो स्वयं गीता में इसकी घोषणा किए हैं। जगत में जो भी भेद दिखाई देता है अथवा जो भी विषमता है, वह प्रकृति, गुण और कर्मजन्य है अथवा वर्तमान में उद्योग-भेद से उत्पन्न है; उसमें भगवान का कोई आग्रह नहीं है। *** जिस प्रकार माता-पिता अपनी संतान में भेद-बुद्धि नहीं रखते, बावजूद इसके कि उनकी सभी संतानें अपने पूर्वजन्म-कृत कर्मों के फल अथवा वर्तमान में अपनी रुचि एवं क्षमतानुसार भिन्न-भिन्न स्वभाव और कर्म करने वाली हो सकती हैं, उसी तरह इस जगत में प्रत्येक जीव का शारीरिक, बौद्धिक एवं स्वाभाविक श्रेष्ठत्व या न्यूनता एक-दूसरे से भिन्न हो सकती है। भगवान के साक्षात् इस भेद में कोई विशेष महत्व नहीं है, क्योंकि भगवान ही जगत के माता-पिता हैं। लेकिन जिस प्रकार संतानों में अपने माता-पिता के प्रति अलग-अलग भावना होती है। किसी को लगता है कि उनके मां-बाप ने उनके लिए कुछ नहीं किया तो किसी को यह लगता ह...