कोशी की आत्मकथा
तुमने मुझे 'बिहार का शोक' नाम दिया मुझे उच्छृंखल कहके बदनाम किया मेरे क्रीड़ा क्षेत्रों को छोटा करने का काम किया तब भी जब न तुम्हें संतोष हुआ तुम्हें मुझे बांधने का जोश हुआ फिर याद रखना मेरी बातों को तुम्हारा अस्तित्व मुझ पर निर्भर तुम्हारा कृतित्व मुझी से निकष जो बांधे अपनी बहनों का हाथ-पैर वो दौलत शोहरत के बावजूद रह सकते नहीं खुश मेरे बग़ैर *** जब-जब तुम बहनों को दीवारों से बांधोगे बहनों को आपस में मिलने से तुम रोकोगे तब-तब तुम पछताओगे जब-जब तुम मुझे कोसोगे तब-तब तुम ज़ार-ज़ार रोओगे ~राजीव रंजन प्रभाकर