आत्मानं रथिनं विद्धि
आत्मानं रथिनं विद्धि ********************************** शरीर और आत्मा अलग-अलग है किन्तु जब तक जीवन है,दोनों हीं एक दूसरे के लिए आवश्यक है. किंतु जब तुलना करें तो आत्मा का महत्व शरीर से अधिक है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आपकी कार चाहे जितनी क़ीमती हो उसका मूल्य आपसे अधिक नहीं है क्योंकि आप अनमोल हैं. जिस प्रकार कार आपको गंतव्य तक पहुंचाने में सहायक है उसी प्रकार आपका शरीर आपको अंतिम यात्रा तक ले जाने में सहायक है. एक साधन है तो दूसरा साध्य. इस दृष्टिकोण से शरीर को स्वस्थ(जो स्वयं में स्थित हो) रखना आवश्यक है. जिस भी लौकिक अभीष्ट यथा धन, बल-बुद्धि यश-कीर्ति अथवा पारलौकिक उद्देश्य यथा मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हेतु श्रम-उद्योग,पूजा,जप तप,योग,ज्ञान नियमादि किए जाते हैं वे सभी शरीर से हीं सधते हैं. इसलिए शरीर को *साधन धाम* कहा गया है. ग़लती तभी होती है जब हम शरीर को हीं आत्मा मान लेते हैं जैसे कोई मूढ़ अपनी कार को हीं स्वयं या स्वयं को हीं कार मान ले. ***************************** इस विषय में शास्त्र में एक सुंदर श्लोक है जिसमें आत्मा, शरीर, इंद्रिय तथ...