Posts

हरिहर वंदना

हे हरे! हे हर! कोऽन्योऽस्ति भवन्तौ सदृशम्? भवन्तौ संचालकौ अखिलब्रह्माण्डम् परन्तु स्वयं स्थ: श्रियागिरिजया संचालितम् लोकवेदप्रतिष्ठाचसाध्यन्ते भवतो: स्मरण् भवन्तौ हि स्वामि-सेवक-सखा परस्परम् तत्वत: वै भवन्तौ परस्परैकम् अज्ञानेन भासते भवन्तौ परस्पर भिन्नम् संसारतापतप्तत्रस्तःअहम् भवतो: सेवकम् कदा सुखी भविष्यति भवन्तौ भजनम्? हे हरिहरम्! भवतो: चरणेषु करोमि आत्मार्पितम्।                     (स्वरचित) ~ राजीव रंजन प्रभाकरः ********************************* हे हरि! हे हर! आप दोनों के जैसा दूसरा कौन है? आप दोनों हीं अखिल ब्रह्माण्ड के संचालक हो परन्तु स्वयं दोनों ही श्री एवं गिरिजा से संचालित हैं. लोक वेद में प्रतिष्ठा आप दोनों से ही सधते हैं.आप दोनों एक साथ हीं एक दूसरे के स्वामी सखा और सेवक हैं. तत्वत: निस्संदेह आप दोनों एक ही हैं. अज्ञानतावश हीं आप दोनों एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं. संसार ताप से तप्त-त्रस्त आपका ये सेवक आपको भजते हुए कब सुखी होगा? हे हरिहर! आपके चरणों मैं स्वयं को अर्पित करता हूॅं।

लोभ: हरति विवेकम्

एकः मर्कटः आसीत्। सः वृक्षस्य शाखायां वसति स्म। असौ शाखा एकस्य गृहस्वामिनः गृहाङ्गणं स्पृशति स्म। मर्कटः स्वभावेन अति उच्छृङ्खलः आसीत्। सः बहुधा वृक्षशाखाया सहाय्येन गृहाङ्गणं प्रविश्य गृहस्वामिनः भोजनभाण्डानि, पात्राणि, वस्त्राणि च छिन्नभिन्नानि कृत्वा भोज्यपदार्थान् सहितः पलायति स्म। वानरस्य क्रियाकलापैः गृहपति अत्यन्तं दुःखितः कुपितश्च आसीत्। अन्ते गृहपतिः वानरं बन्धितुं एकां युक्तिम् अयोजयत्। सः हट्टं गत्वा एकं पात्रम् आनीतवान्, यस्य मुखं अत्यन्तं कुण्ठितम् आसीत्। गृहस्वामी तस्मिन् पात्रे बहून् चणकदानान् निक्षिप्य गृहाङ्गणे स्थापितवान्। वानरः पात्रे स्वादिष्टान् चणकान् दृष्ट्वा लुब्धः अभवत्। यदा गृहस्वामी बहिः अगच्छत्, तदा मर्कटः सपदि आगत्य पात्रे हस्तं प्रावेशयत्। सः मुष्टिकायां चणकान् गृह्णाति स्म, किन्तु पात्रस्य कुण्ठितमुखत्वात् तान् निष्कासयितुं न शक्नोति स्म। बारंबारप्रयत्नेन अपि असफलः सः हतबुद्धिः अभवत्। अस्यैव क्षणे योजनानुसारं गृहस्वामी आगत्य मर्कटस्य उपरि जालं क्षिप्त्वा तम् अबध्नात्। शिक्षा: अस्याः कथायाः शिक्षा अस्ति यत् — लोभः मनुष्यस्य विवेकं हरति, अपि च कस्यापि अतिशय...

क: कुत्र मित्र:?

विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ अर्थ: बाहर विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, बीमार व्यक्ति के लिए औषधि मित्र होती है और मृतक के लिए धर्म ही उसका परम मित्र है.

बसंतागत:

माघान्ते आगच्छति फाल्गुन:। हिंदू पंचांगानुसारे फाल्गुन मास: वर्षस्य अंत: अपि च चैत्र मास: भवति वर्षारंभ:। परन्तु बसंत ऋतो: विस्तार माघ शुक्ल पक्षात चैत्र शुक्ल पक्ष पर्यंत परिगण्यते. तदर्थे वर्षांतश्च वर्षारम्भ: उभौ भवतौ बसंत ऋतवे.               *** यदा पौष-माघ द्वयो मासौ अति शैत्यम् हेतवे जनजीवनम् अत्यंत शिथिलम् जायते तदा प्रकृति: उपहारस्वरुप बसंतरूपेण आगत्य जीवने ऊर्जा संचारम् करोति.  यदस्ति सूचक: शैत्यावसान: अपि च निदाघस्य आगमनम् असौ बसंत:।       तर्हि एतस्मिन वयम् अनुभवाम: खंडित शैत्यम खंडित ग्रीष्मम्। सूर्योदय: भवति क्वचित पूर्वम् ।तदर्थे दिवावधि क्रमशः दीर्घकालिक जायते.       *** बसंत: भवति कुसुमाकर:।  भगवद्गीतायां भगवान् स्वतुलना कुसुमाकरेण अकरोत-" "मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर:" नव द्रुम: पत्रेण-पल्लवेन सज्जते.  प्राप्ते बसंत: वृक्षानाम शाखा: पत्रै: पुष्पै: फलै:च शोभन्ते.              *** माघ शुक्ल पंचमी तिथौ विद्यार्थिन: सरस्वती पूजा आयोजनम् कुर्वन्ति. विद...

शाश्वत

   यदासीत अतीते  यदभविष्यति भविष्ये  अपि च वर्तमाने विद्यमानम् वदन्ति विद्वांसश्च शास्त्राणि तन्नेतिनित्यमनिरंतरमभीक्षणम्

राम नाम खेती की तैयारी

मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. १.इस खेती में लागत कुछ ना  उपज होत है बड़ी भारी इस खेती का मोल अमोल है न कोई जमींदार की बटाईदारी मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. २.इस खेती में न कोई जुताई न कोई निराई और गुड़ाई न कोई हल-बैल न हिं ट्रैक्टर न कोई सिंचाई  मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. ३.इस खेती में न कोई ईति भीति न कोई पहरेदारी न कोई चिरौरी खाद-बीजन खातिर साहिबन के और न उन कर खातिरदारी  मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.  ४.इस खेती में न फिकिर बिक्री के  न कोई दाही जारी और न केकरो देनदारी       मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी     ५.रामनाम बीज छींटता जा साॅंस से  है ये परम कल्याणकारी  साधो!इसी में छिपी है गती तुम्हारी मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.            (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर दाही-जारी--बाढ़ और सूखा ईति भीति- ये शास्त्र में छ: बताए गए हैं-         *अधिक जल बरसना,...

एकांत

एकांत आनन्द का अक्षय स्रोत है और भीड़जन्य अकेलापन दुःख का हेतु  राजीव रंजन प्रभाकर  १८.०१.२०२६.

मूर्ख विद्वान तुलना

वरम् अस्ति तूष्णीम् भूत्वा जनानाम् दृष्टौ मूर्खम्   न तु विद्वानाख्यां हेतो जनमध्ये विवादसृजनम्

मूर्ख बनाम विद्वान

चुप रहकर मूर्ख कहलाना विद्वान बनकर विवाद उत्पन्न करने से श्रेयस्कर है 

मकरप्राप्त भाष्करस्य तेज:

मकरप्राप्त भाष्करस्य यथा तेज: वर्धते। तथा भवतां तेज: वर्धते इति कामये।।         *** जिस प्रकार मकर राशि में प्रवेश करते हीं भगवान सूर्यदेव का तेज बढ़ता हीं जाता है उसी प्रकार आपके तेज(आरोग्य, बल,धैर्य,शील क्षमता,यश,कीर्ति एवं शौर्य) में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो,ऐसी कामना है. ~राजीव रंजन प्रभाकर.

लहज़ा तल्ख़ चेहरा सख़्त

लहज़ा तल्ख़ चेहरा सख़्त ओहदा ऊॅंचा ढ़ीला नफ़्स अकड़ ऐसा मानो हो सूखा शजर न दे कोई छाउॅं न कोई समर हो जब ऐसा हाकिम-ए-तख्त मत जाओ ऐसे साहब के दर            ~राजीव रंजन प्रभाकर  [शजर-पेड़ समर-फल तल्ख़- स्वभाव की उग्रता  लहज़ा-बात करने व पेश आने का ढ़ंग  नफ़्स-इंद्रिय संयम(आत्मनियंत्रण) दर-चौखट/दरवाज़ा  हाकिम-ए-तख्त-कुर्सी पर काबिज़ साहब]  لہجہ تلخ چہرا سخت  عہدہ اونچہ دھیلا نفس اکڑ ایسا مانو ہو سوکھا شجر نہ دے کوئی چھاؤں نہ کوئی ثمر  ہو جب ایسا حاکم تخت مت جاؤ ایسے صاحب کے در ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

रातें सर्द चेहरा ज़र्द

रातें सर्द चेहरा ज़र्द  लिहाफ़ भी नदारद  या ख़ुदा तूने ठंड दिया  तो साथ में  लिहाफ़ व ग़िलाफ़ भी दे. लिहाफ़-ग़िलाफ़ मुश्किल हो तो  तो कम-से-कम एक कम्बल हीं दे दे; कम्बल भी मुमकिन नहीं तो  तो फ़क़त एक चादर हीं दे.  चादर-कंबल पाने का भी मैं क़ाबिल नहीं  तो कम-से-कम  क़ाबिल-ए-बर्दाश्त हौसला हीं दे. *** लेकिन दे; क्योंकि  देना है तुम्हारी सिफ़त  और लेना है  इस नाचीज़ की 'आदत. ~राजीव रंजन प्रभाकर. راتیں سرد چہرا زرد  لہاف بھی ندارد  یا خدا! تونے ٹھنڈ دیا  تو ساتھ میں  لہاف و غلاف بھی دے لہاف-غلاف مشکل ہو تو  کم-سے-کم ایک کمبل ہیں دے دے کمبل بھی ممکن نہیں تو  فقط ایک چادر ہیں دے چادر-کمبل پانے کا بھی   میں قابل نہیں  تو کم سے کم قابل برداشت  حوصلہ ہیں دے ** لیکن دے،کیونکہ دینا ہے تمہاری صفت اور لینا ہے  اس ناچیز کی عادت۔ بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

मित्रों! यह संसार एक सिनेमा है.

मित्रों!यह संसार एक सिनेमा है. सिनेमा का मुझे हीरो नहीं बनना है. अभिनेता भी नहीं बनना है.  न साइड रोल कोई करना है. केवल बैठकर चुपचाप इसे देखने की चाहना है.  निर्माता-सह-निर्देशक के निर्माण-निर्देशन को कोशिश कर समझना है.  समझ नहीं पाने पर घर जाकर सो जाना है. सोना, उठकर बैठ देखना और सोचना  फिर भी निर्देशन की बारिकियों को समझ नहीं पाना है. तब भी जीवन भर यही क्रिया दुहराना है. मित्रों! यह संसार एक सिनेमा है.              ~राजीव रंजन प्रभाकर.

हे प्रभु! देहि मे तद्जीवनम्

हे प्रभु!  देहि मे तद् जीवनम् । यद्भवति तव आश्रितम् ।। देहि मे तद्धैर्यम्। योऽस्ति विना दैन्यम् च पलायनम्।। देहि मे तद् सौख्यम्।  योऽस्ति अन्येषु विना क्लेषोत्पादकम्।। देहि मे तद् गुरूता। यद्भवति रहित यांच्या।।  देहि मे तद् लघुता। यद्शक्नोतिस्पर्शम् तव पादुका।।                  (स्वरचित)           ~राजीव रंजन प्रभाकर. *** O God! Give me that life which is dependent on You. Give me that patience that fights helplessness or timidity driven avoidance either. Give me that pleasure which doesn't produce pain to others. Give me that gravity which comes without cravings from anyone for anything. Give me that smallness that is able to touch your feet only.             ~R.R.Prabhakar.

गणेशजी के फुसलेबाक लेल

पार्वती'क होरिल शिव'क दुलरूआ माए'क कोरा सॅं उठू हमर गणेश बौआ कार्तिक के छोटकू मोदक के पेटू विघ्न'क गलघोंटू हमर गणपति बौआ शुभकार्य'क हेतु हमर गजानन बौआ चलू हम अहाॅं के मोदक देब यौ गणेश बौआ                    ***       [होरिल-कोरा'क लेधूरिया बालक जे अखन तैक माए'क दूध पिबैत हो       लेधूरिया- धूरा-माइट में लेटाइ वला बच्चा        माए'क कोरा- माॅं के गोदी        मोदक- लड्डू ]                        (स्वरचित)            ~राजीव रंजन प्रभाकर

मैथिली भाषा'क किछु मौलिक शब्द पर चर्चा

गाम से एक गोटे आयल छला. हमर बेटी हुनका पैर छूबि प्रणाम केलक.  ओ आशीर्वाद दैत कहलैन- नीके रहू. ओ अभ्यागत हमरा से पूछलैन-इ अपने’क कनकिरबी थिक? हम कहलिए-हॅं ओ-वाह, बड्ड नीक. जखन ओ गेलैथ तऽ हमर बेटी हमरा सॅं पूछलक-पापा ‘कनकिरबी’ मतलब बेटी होता है?  हम- हाॅं,और कनकिरबा का अर्थ बेटा. बेटी- मैं अनुमान से समझ गई थी. यद्यपि हमर बेटी’के मैथिली बाजै लै आबै छै. किंतु सामान्य बोलचाल में एहि तरह शब्द’क प्रयोग हमहूॅं तऽ बुझू नहिए करैत छी ते ओ कोना बुझैत.अस्तु ********************************************** आय काल्हि जे मैथिली बजनिहार छैथ सेहो मैथिली भाषा केर बहुत रास शब्द सॅं जेना अनभिज्ञे बुझू. एकर अनुभव यदा-कदा हमरा होयत रहैत अछि. आब मैथिल सब जे छैथ उहो मैथिली बाजैत काल में ‘जलखै’ के ब्रेकफास्ट/नाश्ता बजै छैथ तथा ‘भानस’ के रसोई. तहिना ‘भंसाघर’ आजुक दिन में ‘किचन’ कहि सम्बोधित होयत अछि.  एहि तरहे बहुत रास मैथिली भाषा केर मूल शब्द मैथिलियो भाषा’क बोली-चाली में प्रयोग उत्तरोत्तर कम होयत जा रहल अछि. कथा साहित्य में ध्यान देला पर कत‌उ-कत‌उ अवश्य भेंट भऽ सकैछ किंतु बोली चाली में तऽ नहिए’क ब...

नारायणस्मरणस्त्रोत

नारायणस्मरणस्त्रोत. *************************** १.नारायण पादपंकजम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। २.लोक वेद रक्षकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ३.चित्तशुद्धि कारकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌ ४.संसारतापशमनकारणम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ५.सुखसमृद्धिकारकम्।  नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ६.हरस्वामीसखासेवकम्।   नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ७.रामरामेतिमंत्रमुच्चरण्। कदा सुखी भवाम्यहम्।।          नारायण पादपंकजम्।          नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌।                      (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर *** १.श्रीमन्नारायण के पदकमल को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. २.लोक और वेद के रक्षक को  मैं प्रणाम करता हूॅं, में प्रणाम करता हूॅं. ३.चित् के शुद्धिकर्ता को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ४.संसार-ताप के शमनकारण को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ५.सुखसमृद्धि के कारक को  मैं प्रणाम करता हूॅं,मैं प्रणाम करता ...

जो ला न सको छ: तुम तो

जो ला न सको छ: तो अपनों की गोटी हीं काटो मौका़' देखकर जैसे भी हो अपनी गोटी लाल करो                   ** अच्छी-अच्छी बातें कह वा'इज़ कहलाना मक़सूद है सबके सर में यही है सौदा यही अब वाहिद फ़तूर है                     ** कौ़ल और फे'ल में फ़र्क़ अब चौंकाने वाली बात नहीं  अगर एक सा हो मा'लूम तो फिर सहसा हो विश्वास नहीं.               ~राजीव रंजन प्रभाकर  वा'इज़-उपदेशक मक़्सूद-उद्देश्य सर-दिमाग़ सौदा-दीवानगी नुमायाॅं-प्रत्यक्ष फ़तूर- बेचैनी, खोट ख़राबी क़ौल-कथनी फ़ै'ल-करनी फ़र्क़-अंतर جو لا نہ سکو چھہ تو اپنوں کی گوٹی ہیں کاٹو موقع دیکھ کر جیسے بھی ہو اپنی گوٹی لال کرو ** اچھی-اچھی باتیں کہکر واعظ کہلانا مقصود ہے  سب کے سر میں یہی ہے سودا یہی اب نمایاں فتور ہے۔ ** قول اور فعل میں فرق اب چونکانے والی بات نہیں  اگر ایک سا ہو معلوم تو پھر سہسہ ہو وشواس نہیں۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

कभी इसके दर कभी उसके दर

कभी इसके दर कभी उसके दर यूॅं हीं दर-ब-दर जो भटकता पहुॅंचा तेरे दर देखकर तेरा अपनापन  पाकर तेरी मुहब्बत और  नज़रों में मेरा इंतज़ार  मुझे यकीं हुआ कि इस दहर में   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर.             ~राजीव रंजन प्रभाकर (दर=चौखट) (दहर=संसार) کبھی اس کے در کبھی اس کے در یوں ہیں در بہ در  جو بھٹکتا پہونچا تیرے در دیکھ کر تیرا اپناپن پاکر تیری محبت اور  نظروں میں میرا انتظار  مجھے یقیں ہوا کہ اس دہر میں  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر ۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं  ************************************** संसार में प्रायः सभी लोग ईश्वर का नामोच्चार या नाम स्मरण अनिष्ट के निवारण वा अभीष्ट की प्राप्ति के लिए हीं करते हैं.  इसके अतिरिक्त मोहमुक्त एवं नामनिष्ठ संत श्रद्धावश अपने तत्व जिज्ञासा के समाधान हेतु अथवा अपने तत्व ज्ञान के संरक्षण हेतु भी ईश्वर का नाम लेते हैं.                            *** इस प्रकार  ईश्वर का नाम लोग                   या तो भयवश                  या लोभवश                   या श्रद्धावश  लेते हैं. लेकिन ईश्वर का नाम किसी को क्रोधवश लेते नहीं सुना है.देवर्षि नारदजी अपवाद हैं. कारण साफ है कोई अपने से बलवान या सामर्थ्यवान पर क्रोध नहीं कर सकता है; यह अनुभव सिद्ध तथ्य है.        हाॅं;ईश्वर को कोसते हुए हमने जरूर सुना हैं. क्षोभ और स्तोभ दोनों में ईश्वर का नाम ...