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Doing something daily of your choice.

Everyday you must do something of your choice that provides you a sense of fulfillment.                     *** Be that cooking a dish, composing a poem, writing an essay, doing a painting, singing a song, playing an instrument, doing gardening, gazing flowers and beauty of the nature even for a while, observing events happening around you with wisdom'eye, doing an exercise, reading a book, watching a movie, playing a game or sports, completing even a part of the task assigned to you, helping anyone in need; whatever. But do it anyway anytime. Why? It provides food for your Soul which people leave it starved in the spree of getting  ~ R.R.Prabhakar     17.05.2026.

एकान्त

एकान्त  ****** Apropos of एकान्त our ancient sages prescribed for the purification and rejuvenation of the soul. It is neither “isolation”, nor “loneliness”, nor even “solitude”. It is नेति नेति नेति — “not this, not this, not even this.” It is not a retreat born of melancholy, seeking refuge in some alcove from the challenges hurled by the world. Then what is it? It is एकान्त — a state for which English perhaps has no perfect equivalent capable of conveying the full range of meanings contained in its quiver. The experiencers of एकान्त testify that— i) It is the intrinsic need of the self to immerse itself, from time to time, into the self itself, in order to bring forth a renewed self from within. ii) It is an endeavour enabling one to explore, introspect, and retrospect. It is the meeting of one with oneself. iii) It is both a process and an event through which an individual regains his true worth after having been devalued by incessant interaction with the outer world. iv) It en...

प्रेम

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आत्मानं रथिनं विद्धि

आत्मानं रथिनं विद्धि  ********************************** शरीर और आत्मा अलग-अलग है किन्तु जब तक जीवन है,दोनों हीं एक दूसरे के लिए आवश्यक है.  किंतु जब तुलना करें तो आत्मा का महत्व शरीर से अधिक है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आपकी कार चाहे जितनी क़ीमती हो उसका मूल्य आपसे अधिक नहीं है क्योंकि आप अनमोल हैं.  जिस प्रकार कार आपको गंतव्य तक पहुंचाने में सहायक है उसी प्रकार आपका शरीर आपको अंतिम यात्रा तक ले जाने में सहायक है.  एक साधन है तो दूसरा साध्य. इस दृष्टिकोण से शरीर को स्वस्थ(जो स्वयं में स्थित हो) रखना आवश्यक है. जिस भी लौकिक अभीष्ट यथा धन, बल-बुद्धि यश-कीर्ति अथवा पारलौकिक उद्देश्य यथा मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हेतु श्रम-उद्योग,पूजा,जप तप,योग,ज्ञान नियमादि किए जाते हैं वे सभी शरीर से हीं सधते हैं.  इसलिए शरीर को *साधन धाम* कहा गया है.  ग़लती तभी होती है जब हम शरीर को हीं आत्मा मान लेते हैं जैसे कोई मूढ़ अपनी कार को हीं स्वयं या स्वयं को हीं कार मान ले. ***************************** इस विषय में शास्त्र में एक सुंदर श्लोक है जिसमें आत्मा, शरीर, इंद्रिय तथ...

Education that we get

The education we get today only makes us aware of opportunities to grow without intrinsic worth. Rights and entitlements by degrees are its main concerns. It  students to learn to live in an environment where clearing the exams, particularly competition exams,is the objective of the students. That’s it.  It only enabled individuals to amass & earn without conscience and concern.  The pious objective service is gone; The compass is lost and the rudder broken.

श्रम की प्रतिष्ठा

श्रम की प्रतिष्ठा  ************ उत्पादन के घटक के रूप में श्रम और पूंजी का आपस में भाई-बहन का सम्बंध होते हुए भी विडम्बना देखिए कि पूंजी की बहन 'श्रम' कभी भी पूंजी के समकक्ष प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकी.  श्रम के इसी सामाजिक तथा अर्थजन्य कमजोरी की भरपाई पूंजीपति वर्ग ने कोई एक ख़ास दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष की पहली म‌ई को सुरक्षित कर दिया जिसे अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस कहा गया.        सामर्थ्यवान को अपने लिए कोई दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है.  उनके लिए तो दिन होली और रात दिवाली है;  लेकिन,लेकिन, लेकिन  उस तरह से नहीं जैसे कि बच्चन साहब ने "दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला" जाने वालों के लिए कहा है.  मेरे विचार से तो मधुशाला लिखी हीं गई उन लुटे-पिटे मजदूरों के लिए जो अपने साधनाभाव के कारण उपजे विषाद को मिटाने तथा ग़म को ग़लत करने के बहाने होली दीवाली मनाने बरबस चले आते हैं. यहाॅं परसाई जी की भी याद आ रही है जब वे कहते हैं कि कभी सोचा है कि हम ऐसे दिवस क्यों मनाते हैं?    हम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते...

Prioritising importances in life.

If one is required to say what is the most important thing in one's life?  Everyone will say it's one's health; I suppose for obvious reasons. Going further if one is required to say the second most important thing in your life; what will be your response?  Here comes the time to think.  Similarly the third & fourth important things what would you say? It will require more time to decide if asked suddenly. The answer would vary according to the quality of your thinking and things under your possession or what you lacking by the way of a fulfilling life.                 *** To some it may be money or wealth while for some it is education and yet for other ones it's one's family.  The order of precedence may vary from person to person but these will do appear somewhere in the list of top three;I suppose.  Religion may come in the last if the list of choices get expanded to five. Is there any important thing left yet to b...

क्या है ये ज़िन्दगी---

चाहे कोई करे तनक़ीद अपने यक़ीन पर  आगे बढ़ते जाना हीं ज़िंदगी है  बिखरने के बाद निखरने के लिए  ख़ुद को पहले समेटना हीं ज़िंदगी है   दौर ए वक़्त में ख़ुद से ख़ुद को  जीत कर निखरना हीं ज़िदगी है  जब ख़ुद निखर जायें तो दूसरे की  जिंदगी को सॅंवारना हीं ज़िंदगी है  जब दूसरे भी सॅंवरते जाए तो  मुल्क को सॅंवारना हीं ज़िंदगी है  और चाहे कुछ बचे न बचे अपने ज़मीर को  बचा कर रखना हीं ज़िंदगी है. बंदे को मौला से कोई अवार्ड मिले न मिले  इसका कोई ग़म नहीं  ख़ुदा की निगाह में पाक रहने की  कोशिश करते रहना हीं ज़िंदगी है.              ~राजीव रंजन प्रभाकर                    १७.०४.२०२६ چاہے کوئی کرے تنقید اپنے یقین پہ آگے بڑھتے جانا ہیں زندگی ہے۔ بکھرنے کے بعد خود کو سمیٹا ہیں زندگی ہے دور وقت میں خود کو خود سے جیتنا ہیں زندگی ہے  جب خود نکھر جائے تو دوسرے کو سنوارنا ہیں زندگی ہے  جب دوسرے بھی سنورتے جایں تو ملک کو سنوارنا ہیں زندگی ہے۔ ا...

मेरा काम हो वैसा

हे प्रभु रघुनाथा! मेरा काम हो ऐसा जिसमें न लगे कोई पैसा  वैसे  जब पास में न हो पैसा तो काम न करुॅं वैसा              *** फिर भी; जब काम हो हीं ऐसा जबरदस्ता  तो ख़र्च करूॅं ऐसा चाहे बचे न मुझे पैसा              ****** लेकिन लेकिन लेकिन              ****** तब मेरा काम दौड़े ऐसा  जैसे  बच्चे को दौड़ाए कोई भैंसा              **** लेकिन लेकिन लेकिन              ***** प्रभु! ये होगा तभी तो वैसा  जब तूॅं पकड़े रहे मेरा नकबस्सा और खैंचे अपने तरफ़ बरबस्सा ~राजीव रंजन प्रभाकर.

युद्ध की विभीषिका

आज विश्व में सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है.  अमरीका ईरान से तो कहीं रूस यूक्रेन से तो कहीं इजरायल फिलीस्तीन से तो कहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान से लड़े जा रहा है,लड़े जा रहा है. कितनी जानें जा चुकी हैं, कितने हीं आवासीय घर नष्ट हुए जा रहे हैं, कितने हीं सैनिकों के प्राण जा रहे हैं; पर इससे किसी को क्या मतलब! ये तो हुई शासनाध्यक्षों/राष्ट्राध्यक्षों के बीच अहं के टकराव से उत्पन्न युद्ध की स्थिति; इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के आतंकवादी संगठन सहित क‌ई non-state actors भी अपने-अपने तरीके से कुत्सित उद्देश्य के अधीन अपनी बर्बरता एवं हिंसकता से मानवता को परास्त करने पर आमादा हैं.  अलावे इसके पता नहीं और भी कितने जगह तरह-तरह के संघर्ष चल रहे हैं.  सारांश यही कि सभी एक दूसरे के स्वत्व,साधन और संसाधन को कब्जाने के लिए कुछ भी करने को उद्यत हैं. इस उद्योग में आणविक अस्त्र के प्रयोग की धमकी भी शामिल है.   लालच की पराकाष्ठा, द्वेष,नफ़रत एवं बदले की आग में सुलगकर इसकी कोई गारंटी नहीं कि इन आणविक अस्त्रों के प्रयोग की धमकी मात्र धमकी तक हीं सीमित रहे.        ...

हरिहर वंदना

हे हरे! हे हर! कोऽन्योऽस्ति भवन्तौ सदृशम्? भवन्तौ संचालकौ अखिलब्रह्माण्डम् परन्तु स्वयं स्थ: श्रियागिरिजया संचालितम् लोकवेदप्रतिष्ठाचसाध्यन्ते भवतो: स्मरण् भवन्तौ हि स्वामि-सेवक-सखा परस्परम् तत्वत: वै भवन्तौ परस्परैकम् अज्ञानेन भासते भवन्तौ परस्पर भिन्नम् संसारतापतप्तत्रस्तःअहम् भवतो: सेवकम् कदा सुखी भविष्यति भवन्तौ भजनम्? हे हरिहरम्! भवतो: चरणेषु करोमि आत्मार्पितम्।                     (स्वरचित) ~ राजीव रंजन प्रभाकरः ********************************* हे हरि! हे हर! आप दोनों के जैसा दूसरा कौन है? आप दोनों हीं अखिल ब्रह्माण्ड के संचालक हो परन्तु स्वयं दोनों ही श्री एवं गिरिजा से संचालित हैं. लोक वेद में प्रतिष्ठा आप दोनों से ही सधते हैं.आप दोनों एक साथ हीं एक दूसरे के स्वामी सखा और सेवक हैं. तत्वत: निस्संदेह आप दोनों एक ही हैं. अज्ञानतावश हीं आप दोनों एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं. संसार ताप से तप्त-त्रस्त आपका ये सेवक आपको भजते हुए कब सुखी होगा? हे हरिहर! आपके चरणों मैं स्वयं को अर्पित करता हूॅं।

लोभ: हरति विवेकम्

एकः मर्कटः आसीत्। सः वृक्षस्य शाखायां वसति स्म। असौ शाखा एकस्य गृहस्वामिनः गृहाङ्गणं स्पृशति स्म। मर्कटः स्वभावेन अति उच्छृङ्खलः आसीत्। सः बहुधा वृक्षशाखाया सहाय्येन गृहाङ्गणं प्रविश्य गृहस्वामिनः भोजनभाण्डानि, पात्राणि, वस्त्राणि च छिन्नभिन्नानि कृत्वा भोज्यपदार्थान् सहितः पलायति स्म। वानरस्य क्रियाकलापैः गृहपति अत्यन्तं दुःखितः कुपितश्च आसीत्। अन्ते गृहपतिः वानरं बन्धितुं एकां युक्तिम् अयोजयत्। सः हट्टं गत्वा एकं पात्रम् आनीतवान्, यस्य मुखं अत्यन्तं कुण्ठितम् आसीत्। गृहस्वामी तस्मिन् पात्रे बहून् चणकदानान् निक्षिप्य गृहाङ्गणे स्थापितवान्। वानरः पात्रे स्वादिष्टान् चणकान् दृष्ट्वा लुब्धः अभवत्। यदा गृहस्वामी बहिः अगच्छत्, तदा मर्कटः सपदि आगत्य पात्रे हस्तं प्रावेशयत्। सः मुष्टिकायां चणकान् गृह्णाति स्म, किन्तु पात्रस्य कुण्ठितमुखत्वात् तान् निष्कासयितुं न शक्नोति स्म। बारंबारप्रयत्नेन अपि असफलः सः हतबुद्धिः अभवत्। अस्यैव क्षणे योजनानुसारं गृहस्वामी आगत्य मर्कटस्य उपरि जालं क्षिप्त्वा तम् अबध्नात्। शिक्षा: अस्याः कथायाः शिक्षा अस्ति यत् — लोभः मनुष्यस्य विवेकं हरति, अपि च कस्यापि अतिशय...

क: कुत्र मित्र:?

विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ अर्थ: बाहर विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, बीमार व्यक्ति के लिए औषधि मित्र होती है और मृतक के लिए धर्म ही उसका परम मित्र है.

बसंतागत:

माघान्ते आगच्छति फाल्गुन:। हिंदू पंचांगानुसारे फाल्गुन मास: वर्षस्य अंत: अपि च चैत्र मास: भवति वर्षारंभ:। परन्तु बसंत ऋतो: विस्तार माघ शुक्ल पक्षात चैत्र शुक्ल पक्ष पर्यंत परिगण्यते. तदर्थे वर्षांतश्च वर्षारम्भ: उभौ भवतौ बसंत ऋतवे.               *** यदा पौष-माघ द्वयो मासौ अति शैत्यम् हेतवे जनजीवनम् अत्यंत शिथिलम् जायते तदा प्रकृति: उपहारस्वरुप बसंतरूपेण आगत्य जीवने ऊर्जा संचारम् करोति.  यदस्ति सूचक: शैत्यावसान: अपि च निदाघस्य आगमनम् असौ बसंत:।       तर्हि एतस्मिन वयम् अनुभवाम: खंडित शैत्यम खंडित ग्रीष्मम्। सूर्योदय: भवति क्वचित पूर्वम् ।तदर्थे दिवावधि क्रमशः दीर्घकालिक जायते.       *** बसंत: भवति कुसुमाकर:।  भगवद्गीतायां भगवान् स्वतुलना कुसुमाकरेण अकरोत-" "मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर:" नव द्रुम: पत्रेण-पल्लवेन सज्जते.  प्राप्ते बसंत: वृक्षानाम शाखा: पत्रै: पुष्पै: फलै:च शोभन्ते.              *** माघ शुक्ल पंचमी तिथौ विद्यार्थिन: सरस्वती पूजा आयोजनम् कुर्वन्ति. विद...

शाश्वत

   यदासीत अतीते  यदभविष्यति भविष्ये  अपि च वर्तमाने विद्यमानम् वदन्ति विद्वांसश्च शास्त्राणि तन्नेतिनित्यमनिरंतरमभीक्षणम्

राम नाम खेती की तैयारी

मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. १.इस खेती में लागत कुछ ना  उपज होत है बड़ी भारी इस खेती का मोल अमोल है न कोई जमींदार की बटाईदारी मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. २.इस खेती में न कोई जुताई न कोई निराई और गुड़ाई न कोई हल-बैल न हिं ट्रैक्टर न कोई सिंचाई  मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. ३.इस खेती में न कोई ईति भीति न कोई पहरेदारी न कोई चिरौरी खाद-बीजन खातिर साहिबन के और न उन कर खातिरदारी  मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.  ४.इस खेती में न फिकिर बिक्री के  न कोई दाही जारी और न केकरो देनदारी       मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी     ५.रामनाम बीज छींटता जा साॅंस से  है ये परम कल्याणकारी  साधो!इसी में छिपी है गती तुम्हारी मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.            (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर दाही-जारी--बाढ़ और सूखा ईति भीति- ये शास्त्र में छ: बताए गए हैं-         *अधिक जल बरसना,...

एकांत

एकांत आनन्द का अक्षय स्रोत है और भीड़जन्य अकेलापन दुःख का हेतु  राजीव रंजन प्रभाकर  १८.०१.२०२६.

मूर्ख विद्वान तुलना

वरम् अस्ति तूष्णीम् भूत्वा जनानाम् दृष्टौ मूर्खम्   न तु विद्वानाख्यां हेतो जनमध्ये विवादसृजनम्

मूर्ख बनाम विद्वान

चुप रहकर मूर्ख कहलाना विद्वान बनकर विवाद उत्पन्न करने से श्रेयस्कर है 

मकरप्राप्त भाष्करस्य तेज:

मकरप्राप्त भाष्करस्य यथा तेज: वर्धते। तथा भवतां तेज: वर्धते इति कामये।।         *** जिस प्रकार मकर राशि में प्रवेश करते हीं भगवान सूर्यदेव का तेज बढ़ता हीं जाता है उसी प्रकार आपके तेज(आरोग्य, बल,धैर्य,शील क्षमता,यश,कीर्ति एवं शौर्य) में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो,ऐसी कामना है. ~राजीव रंजन प्रभाकर.