भाय कुभाय अनख आलसहूॅं

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं 
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संसार में प्रायः सभी लोग ईश्वर का नामोच्चार या नाम स्मरण अनिष्ट के निवारण वा अभीष्ट की प्राप्ति के लिए हीं करते हैं. 
इसके अतिरिक्त मोहमुक्त एवं नामनिष्ठ संत श्रद्धावश अपने तत्व जिज्ञासा के समाधान हेतु अथवा अपने तत्व ज्ञान के संरक्षण हेतु भी ईश्वर का नाम लेते हैं. 
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इस प्रकार 
ईश्वर का नाम लोग 
                 या तो भयवश
                 या लोभवश 
                 या श्रद्धावश 
लेते हैं.
लेकिन ईश्वर का नाम किसी को क्रोधवश लेते नहीं सुना है.देवर्षि नारदजी अपवाद हैं.
कारण साफ है कोई अपने से बलवान या सामर्थ्यवान पर क्रोध नहीं कर सकता है; यह अनुभव सिद्ध तथ्य है.
       हाॅं;ईश्वर को कोसते हुए हमने जरूर सुना हैं. क्षोभ और स्तोभ दोनों में ईश्वर का नाम लेते देखा जाना हम सभी का प्रायः साधारण सा अनुभव है. 
           बिना इच्छा के भी हम अनायास भगवान का नाम ले लेते हैं जैसे जब कोई अंगराई ले या फिर जम्हाई.
       कुछेक कालनेमी जैसे लोग ईश्वर का नाम कपट से भी लेते हैं, तो कोई अनीश्वरवादी अपनी अनास्था या कथित वैज्ञानिक सोच साबित करने की गरज से उनका नाम उपहास या घृणा से भी लेते हैं.
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 किंतु ऐसे कोई विरले ही होते हैं जो उनका नाम प्रेम के वशीभूत होकर लेते हैं. 
             उन्हें पहचानना प्रायः कठिन है.  
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            किंतु यह भी ध्रुव सत्य है कि ईश्वर का नाम यदि येन केन प्रकारेण भी लिया जाए तो इससे लाभ छोड़ हानि नहीं है.

                     ~राजीव रंजन प्रभाकर

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