श्रम की प्रतिष्ठा
श्रम की प्रतिष्ठा ************ उत्पादन के घटक के रूप में श्रम और पूंजी का आपस में भाई-बहन का सम्बंध होते हुए भी विडम्बना देखिए कि पूंजी की बहन 'श्रम' कभी भी पूंजी के समकक्ष प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकी. श्रम के इसी सामाजिक तथा अर्थजन्य कमजोरी की भरपाई पूंजीपति वर्ग ने कोई एक ख़ास दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष की पहली मई को सुरक्षित कर दिया जिसे अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस कहा गया. सामर्थ्यवान को अपने लिए कोई दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है. उनके लिए तो दिन होली और रात दिवाली है; लेकिन,लेकिन, लेकिन उस तरह से नहीं जैसे कि बच्चन साहब ने "दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला" जाने वालों के लिए कहा है. मेरे विचार से तो मधुशाला लिखी हीं गई उन लुटे-पिटे मजदूरों के लिए जो अपने साधनाभाव के कारण उपजे विषाद को मिटाने तथा ग़म को ग़लत करने के बहाने होली दीवाली मनाने बरबस चले आते हैं. यहाॅं परसाई जी की भी याद आ रही है जब वे कहते हैं कि कभी सोचा है कि हम ऐसे दिवस क्यों मनाते हैं? हम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते...