पता नहीं
पता नहीं
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कोई आएगा नहीं ये पता है
इंतज़ार में बैठा हूॅं क्यों ये
पता नहीं
कोई बुलाएगा नहीं ये पता है लेकिन
कोर्ट वो पतलून क्यों पहने हुए हूॅं ये
पता नहीं
अपने चेहरे की कैफ़ियत मा'लूम है
बार-बार आईना क्यों देखता हूॅं ये
पता नहीं
पते की बात आजकल कोई करता नहीं
लोगों का पता तब क्यों पूछता हूॅं ये
पता नहीं
मुझे मा'लूम है कि ज़िंदगी है बेवफ़ा
उसे रिझाने की ख़्वाहिश क्यों है ये
पता नहीं.
अंजाम-ए-सफ़र क्या होगा पता नहीं
रहजन से कब-कहाॅं हो जाए सामना ये
पता नहीं.
राजीव रंजन प्रभाकर.
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