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Showing posts from March, 2026

युद्ध की विभीषिका

आज विश्व में सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है.  अमरीका ईरान से तो कहीं रूस यूक्रेन से तो कहीं इजरायल फिलीस्तीन से तो कहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान से लड़े जा रहा है,लड़े जा रहा है. कितनी जानें जा चुकी हैं, कितने हीं आवासीय घर नष्ट हुए जा रहे हैं, कितने हीं सैनिकों के प्राण जा रहे हैं; पर इससे किसी को क्या मतलब! ये तो हुई शासनाध्यक्षों/राष्ट्राध्यक्षों के बीच अहं के टकराव से उत्पन्न युद्ध की स्थिति; इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के आतंकवादी संगठन सहित क‌ई non-state actors भी अपने-अपने तरीके से कुत्सित उद्देश्य के अधीन अपनी बर्बरता एवं हिंसकता से मानवता को परास्त करने पर आमादा हैं.  अलावे इसके पता नहीं और भी कितने जगह तरह-तरह के संघर्ष चल रहे हैं.  सारांश यही कि सभी एक दूसरे के स्वत्व,साधन और संसाधन को कब्जाने के लिए कुछ भी करने को उद्यत हैं. इस उद्योग में आणविक अस्त्र के प्रयोग की धमकी भी शामिल है.   लालच की पराकाष्ठा, द्वेष,नफ़रत एवं बदले की आग में सुलगकर इसकी कोई गारंटी नहीं कि इन आणविक अस्त्रों के प्रयोग की धमकी मात्र धमकी तक हीं सीमित रहे.        ...

हरिहर वंदना

हे हरे! हे हर! कोऽन्योऽस्ति भवन्तौ सदृशम्? भवन्तौ संचालकौ अखिलब्रह्माण्डम् परन्तु स्वयं स्थ: श्रियागिरिजया संचालितम् लोकवेदप्रतिष्ठाचसाध्यन्ते भवतो: स्मरण् भवन्तौ हि स्वामि-सेवक-सखा परस्परम् तत्वत: वै भवन्तौ परस्परैकम् अज्ञानेन भासते भवन्तौ परस्पर भिन्नम् संसारतापतप्तत्रस्तःअहम् भवतो: सेवकम् कदा सुखी भविष्यति भवन्तौ भजनम्? हे हरिहरम्! भवतो: चरणेषु करोमि आत्मार्पितम्।                     (स्वरचित) ~ राजीव रंजन प्रभाकरः ********************************* हे हरि! हे हर! आप दोनों के जैसा दूसरा कौन है? आप दोनों हीं अखिल ब्रह्माण्ड के संचालक हो परन्तु स्वयं दोनों ही श्री एवं गिरिजा से संचालित हैं. लोक वेद में प्रतिष्ठा आप दोनों से ही सधते हैं.आप दोनों एक साथ हीं एक दूसरे के स्वामी सखा और सेवक हैं. तत्वत: निस्संदेह आप दोनों एक ही हैं. अज्ञानतावश हीं आप दोनों एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं. संसार ताप से तप्त-त्रस्त आपका ये सेवक आपको भजते हुए कब सुखी होगा? हे हरिहर! आपके चरणों मैं स्वयं को अर्पित करता हूॅं।

लोभ: हरति विवेकम्

एकः मर्कटः आसीत्। सः वृक्षस्य शाखायां वसति स्म। असौ शाखा एकस्य गृहस्वामिनः गृहाङ्गणं स्पृशति स्म। मर्कटः स्वभावेन अति उच्छृङ्खलः आसीत्। सः बहुधा वृक्षशाखाया सहाय्येन गृहाङ्गणं प्रविश्य गृहस्वामिनः भोजनभाण्डानि, पात्राणि, वस्त्राणि च छिन्नभिन्नानि कृत्वा भोज्यपदार्थान् सहितः पलायति स्म। वानरस्य क्रियाकलापैः गृहपति अत्यन्तं दुःखितः कुपितश्च आसीत्। अन्ते गृहपतिः वानरं बन्धितुं एकां युक्तिम् अयोजयत्। सः हट्टं गत्वा एकं पात्रम् आनीतवान्, यस्य मुखं अत्यन्तं कुण्ठितम् आसीत्। गृहस्वामी तस्मिन् पात्रे बहून् चणकदानान् निक्षिप्य गृहाङ्गणे स्थापितवान्। वानरः पात्रे स्वादिष्टान् चणकान् दृष्ट्वा लुब्धः अभवत्। यदा गृहस्वामी बहिः अगच्छत्, तदा मर्कटः सपदि आगत्य पात्रे हस्तं प्रावेशयत्। सः मुष्टिकायां चणकान् गृह्णाति स्म, किन्तु पात्रस्य कुण्ठितमुखत्वात् तान् निष्कासयितुं न शक्नोति स्म। बारंबारप्रयत्नेन अपि असफलः सः हतबुद्धिः अभवत्। अस्यैव क्षणे योजनानुसारं गृहस्वामी आगत्य मर्कटस्य उपरि जालं क्षिप्त्वा तम् अबध्नात्। शिक्षा: अस्याः कथायाः शिक्षा अस्ति यत् — लोभः मनुष्यस्य विवेकं हरति, अपि च कस्यापि अतिशय...