श्रम की प्रतिष्ठा
श्रम की प्रतिष्ठा
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उत्पादन के घटक के रूप में श्रम और पूंजी का आपस में भाई-बहन का सम्बंध होते हुए भी विडम्बना देखिए कि पूंजी की बहन 'श्रम' कभी भी पूंजी के समकक्ष प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकी.
श्रम के इसी सामाजिक तथा अर्थजन्य कमजोरी की भरपाई पूंजीपति वर्ग ने कोई एक ख़ास दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष की पहली मई को सुरक्षित कर दिया जिसे अंतरराष्ट्रीय श्रम दिवस कहा गया.
सामर्थ्यवान को अपने लिए कोई दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है.
उनके लिए तो दिन होली और रात दिवाली है;
लेकिन,लेकिन, लेकिन
उस तरह से नहीं जैसे कि बच्चन साहब ने "दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला" जाने वालों के लिए कहा है.
मेरे विचार से तो मधुशाला लिखी हीं गई उन लुटे-पिटे मजदूरों के लिए जो अपने साधनाभाव के कारण उपजे विषाद को मिटाने तथा ग़म को ग़लत करने के बहाने होली दीवाली मनाने बरबस चले आते हैं.
यहाॅं परसाई जी की भी याद आ रही है जब वे कहते हैं कि कभी सोचा है कि हम ऐसे दिवस क्यों मनाते हैं?
हम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं उसी तरह कोई अन्तर्राष्ट्रीय पुरूष दिवस क्यों नहीं मनाते? जैसे हम हिंदी दिवस(अन्तरराष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों) मनाते हैं कोई कहीं अंग्रेजी दिवस तो मनते/मनाते नहीं दिखता!
न कोई थानेदार दिवस,न कोई साहूकार दिवस; बड़ी 'अजीब बात है.
न हीं मैंने अन्तर्राष्ट्रीय श्रम दिवस की तर्ज़ पर कहीं से कोई अन्तर्राष्ट्रीय पूंजी दिवस मनते देखा. कहीं से कोई न मांग न हीं इसकी कोई आवश्यकता.
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असल बात यह है कि बड़े-बड़े देशों के लोग सभ्यता की रक्षा,पोषण एवं विकास के लिए कमजोर देशों के लोगों पर मिसाल दाग-दाग कर अपना उत्पादन,वाणिज्य एवं व्यापार बढ़ाने में इतना बेदम और व्यस्त हो गए हैं कि ऐसे दिवसों की रचना करना भी उनकी विवशता हो गई है ताकि कमज़ोरों के छोटे-मोटे संघर्ष को याद रखने में उन्हें सहायता मिल सके.
साथ हीं कमज़ोर को भी यह लगे कि नहीं भाई! उनकी भी ताक़तवर के बरक्स एक हस्ती है.
मतलब कि एक तीर से दो लक्ष्यों का वेधन.
वरना अब ऐसे दिवसों का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है सिवा सरकारी कार्यालयों में उस दिन की छुट्टी के या कहीं-कहीं हो रहे श्रम की महत्ता पर नेताओं द्वारा दिए जा रहे व्याख्यानों के या कतिपय कार्यशालाओं के आयोजन के.
मेरे इस छोटे से इस लघुलेख के सम्बन्ध में भी आप ऐसा कह सकते हैं. ऐसा कहना बिलकुल सही भी होगा.
लेकिन एक बात तय है *-- *वह ये कि श्रम की महत्ता शाश्वत है ** भले इसकी अपरिहार्यता का अहसास के बावजूद पूंजी इसे इसकी प्रतिष्ठा देने हेतु तैयार न हो.
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प्रतिष्ठा और श्रम शायद oxymoron हैं. यदि ऐसा न होता तो प्रतिष्ठित पूंजीपतियों के तो नाम एक क्षण में दसियों गिनाये जा सकते हैं लेकिन प्रतिष्ठित श्रमिकों के शायद एक भी नहीं.
"श्रम की प्रतिष्ठा" जिसे अंग्रेजी में "dignity of labour" कहा गया है, उसे prestige of labour बनने में अभी लम्बा रास्ता तय करना होगा.
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अन्तर्राष्ट्रीय श्रम दिवस की अशेष शुभकामनाएं
~राजीव रंजन प्रभाकर
०१.०५.२०२६
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