आत्मानं रथिनं विद्धि
आत्मानं रथिनं विद्धि
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शरीर और आत्मा अलग-अलग है किन्तु जब तक जीवन है,दोनों हीं एक दूसरे के लिए आवश्यक है.
किंतु जब तुलना करें तो आत्मा का महत्व शरीर से अधिक है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आपकी कार चाहे जितनी क़ीमती हो उसका मूल्य आपसे अधिक नहीं है क्योंकि आप अनमोल हैं.
जिस प्रकार कार आपको गंतव्य तक पहुंचाने में सहायक है उसी प्रकार आपका शरीर आपको अंतिम यात्रा तक ले जाने में सहायक है.
एक साधन है तो दूसरा साध्य. इस दृष्टिकोण से शरीर को स्वस्थ(जो स्वयं में स्थित हो) रखना आवश्यक है.
जिस भी लौकिक अभीष्ट यथा धन, बल-बुद्धि यश-कीर्ति अथवा पारलौकिक उद्देश्य यथा मोक्ष या परमात्मा की प्राप्ति हेतु श्रम-उद्योग,पूजा,जप तप,योग,ज्ञान नियमादि किए जाते हैं वे सभी शरीर से हीं सधते हैं.
इसलिए शरीर को *साधन धाम* कहा गया है.
ग़लती तभी होती है जब हम शरीर को हीं आत्मा मान लेते हैं जैसे कोई मूढ़ अपनी कार को हीं स्वयं या स्वयं को हीं कार मान ले.
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इस विषय में शास्त्र में एक सुंदर श्लोक है जिसमें आत्मा, शरीर, इंद्रिय तथा मन, बुद्धि को समझाया गया है. ये श्लोक कठ उपनिषद में पाया जाता है.
*आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु
बुद्धि तु सारथी विद्धि मन: प्रग्रह मेव च
इंद्रियाणि हयानाहु विषयानस्तेषु गोचरान
आत्मेन्द्रियेमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिन:*
इस 'शरीर' को तुम एक 'रथ' समझो तथा अपनी 'आत्मा' को 'रथी' अर्थात उसका स्वामी.
शरीर रूपी इस रथ को हांकने वाले 'सारथी' को तुम अपना 'बुद्धि' समझो तथा इस शरीर रूपी रथ में जुते 'घोड़े' को तुम 'इंद्रिय' समझो तथा घोड़े का जो रास('प्रग्रह' अर्थात् लगाम) है वह हमारा 'मन' है जो बुद्धि रूपी सारथी के हाथ में सदैव रहती है.
काम, क्रोध, लोभ,मोह,मत्सर जो इंद्रियों के विषय हैं से बुद्धि जब-जब किसी समय मोहित हो जाती है तभी बुद्धि के हाथ में जो मन रुपी रास (लगाम) है वह तब-तब ढ़ीली पड़ जाती है और इंद्रिय सहित शरीर को काम, क्रोध आदि विषयरुपी मार्ग पर दौड़ते हुए इंद्रियरुपी घोड़े को तो नुक़सान पहुॅंचाते हीं हैं साथ में शरीर रूपी रथ को भी क्षतिग्रस्त कर उसे नष्ट कर देती है.
आत्मा को भी उस मन, बुद्धि और शरीर के साथ उन विषयों का भोक्ता होना पड़ता दिखाई देता है.
किंतु इसके होते हुए भी मन, बुद्धि, इंद्रिय तथा शरीर नष्ट हो जाने के बावजूद आत्मा नष्ट नहीं होती है.
हाॅं; रथ पर सवार वह आत्मा अंततोगत्वा अपना वह रथ बदलकर दूसरे रथ पर सवार हो जाता है.
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इत्यलम्
राजीव रंजन प्रभाकर.
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