प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है.

प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है.
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प्रेम और व्याकुलता में प्रभु के स्मरण की तो बात हीं क्या है अपितु भय-भ्रम से, लोभ-लालच से, रोष-आक्रोश से, राग-द्वेष से, हास-परिहास से भी उनका स्मरण सदैव हित प्रद, लाभप्रद, सुखप्रद तथा शांतिप्रद होता है.
 प्रभु स्मरण बुद्धि को शुद्धता प्रदान करता है.
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प्रभु स्मरण के संदर्भ में संस्कृत का निम्न श्लोक द्रष्टव्य है-
शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् ।
लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत ॥
      व्यक्ति को सौ कार्य छोड़कर पहले भोजन करना चाहिए तथा एक हजार कार्यों को छोड़कर स्नान कर लेना चाहिए तथा लाखों व्यस्तताओं को त्यागकर दान करने का सत्कार्य करना चाहिए तथा प्रभु का स्मरण तो करोड़ों काम छोड़कर करना चाहिए.
आश्चर्य है कि यह जान कर भी ऐसा कर पाना प्रायः कठिन होता है.
प्रायः कार्य के दबाव में घर से बिना स्नान एवं भोजन किए बाहर निकल जाना, सुपात्र व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित होने पर सामर्थ्य के बावजूद मदद नहीं करना तथा जो सर्वशक्तिमान है एवं जिसकी कृपा से हीं हमारे सभी कार्य सिद्ध होते हैं,उनका स्मरण तक नहीं करना आदि अधिकांश में हम सभी का स्वभाव हो गया है. 
ये व्यावहारिक एवं शास्त्रीय दोनों दृष्टिकोण से ठीक नहीं है.
           ~राजीव रंजन प्रभाकर
                  (हनुमान जयंती)
                   १९.१०.२०२५.

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