जीवनपर्यंत हम कुछ न कुछ करते हीं रहते हैं. यह भी सच है कि कुछ किये बिना रह भी नहीं सकते. प्राणयात्रा से लेकर शारीरिक यात्रा भी बिना कर्म किये असम्भव है. कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्वार्थ से लेकर परमार्थ तक हमारी सारी गतिविधियां प्रायः स्वयं को केन्द्र में रखकर ही होती है. किन्तु ईश्वर को हमारे इन कर्मों से कोई मतलब नहीं है. उनको यदि सरोकार है तो हमारी उन क्रियाओं के पीछे छुपे भाव से. वे ये भी नहीं देखते कि उन्हें भजने वाला मूरख है या विद्वान. वे तो केवल प्रेम देखते हैं, भावना देखते हैं,समर्पण देखते हैं. तभी एक श्लोक है कि व्याकरणज्ञान से रहित कोई मूर्ख शुद्धश्रद्धाभावेन 'विष्णवे नमः' के बदले 'विष्णाय नमः' का भी पाठ करे तो फल की दृष्टि से कोई अंतर नहीं होगा; कारण भगवान् क्रियाग्राही हैं ही नहीं, वे तो भावग्राही ठहरे. मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे। तयोः फलं तुल्यं हि भावग्राही जनार्दनः।। वे तो इतने भावग्राही हैं कि प्रेमपूर्वक अर्पित पत्र, पुष्प, फल वा जल को खा तक लेते है. इसे देखने का न तो हममें सामर्थ्य है न हीं सारग्राहिणी-सूक्ष्मदर्शिणी बुद्धि. पत्...
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