उपर्युक्त शीषर्क श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम अध्याय का ६६वां श्लोकांश है जो पूर्ण में निम्नवत है - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। प्रायः उपरोक्त श्लोक की विवेचना सत्संग में जहां भगवान् और भक्त के सम्बंध में चर्चा हो रही होती है, की जाती है। भगवान् युद्धभूमि में भी मोह और विषाद से दग्ध अर्जुन को सब कुछ बता चुके थे।वे आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, कर्मबंधन से छुटकारा हेतु कर्तव्यकर्म की अनिवार्यता, ज्ञान, कर्म, भक्ति, त्याग तथा सन्यासादि विषयक तत्वों पर व्यापक रूप से प्रकाश डाल चुके थे। यहां तक कि अपनी विभूतियों के विषय में भी सोदाहरण बताने के तदनन्तर अपना विराट रूप सहित चतुर्भुज रूप से भी अर्जुन को दर्शन करा चुके थे भगवान्। अनेक प्रकार से समझाने पर भी अंत में सारांशरूपेण उन्होंने अर्जुन से यही कहा कि तुम सभी आश्रय को छोड़ एकमात्र मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा। कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। न हीं क्या कर्म है, क्या अकर्म है क्या विकर्म है इत्यादि जो तत्वज्ञ तक को मोहित करनेवाले हैं, पर जरूरत से...
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