खाली वक़्त में भी कहां आराम है?
खाली वक़्त में भी कहाँ आराम है,
अपनी किस्मत में तो
खाली वक़्त में भी
काम, काम और सिर्फ़ काम है।
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खाली वक़्त का वजूद तो ख़ामख़याली है,
वरना काम की बेशुमारी से अक़्ल की पामाली है।
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सर खुजाने से फ़ुर्सत मिली नहीं
कि कान ने भी खुजाने की दस्तक दे डाली।
फिर नाक ने अपने बंद होने की अर्जी थमा दी।
बिस्तर पर लेटे रहने की ज़िम्मेदारी,
घूमते सीलिंग फ़ैन को घूरने की जवाबदारी,
कमरे की दीवारों के हो चले पुराने रंग के बहाने
आईने में अपने चेहरे की सलवटें देखने की होशियारी—
इनसे फ़ारिग़ हुए नहीं
कि मोबाइल के नोटिफ़िकेशन का इंतज़ार
मुंह बाए खड़ा है।
इससे निबटे नहीं कि घुटनों के दर्द को सहलाने में
क़ीमती मेरा वक़्त सर्फ़ हुआ जा रहा है।
दर्द से नीम-आराम मिला नहीं
कि कान की सनसनाहट
अपनी अहमियत से वाक़िफ़ कराने लगी।
दाॅंत का दर्द अलग से तवज्जो की धमकी
दे रहा है.
और टेबल पर रखी बीपी और शुगर की गोलियाँ!
इसे समय पर निगलने की ज़िम्मेदारी भी तो मेरी हीं है!
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अख़बार कह रहा है—
पहले मुझे पढ़ो,
और टीवी का हुक्म है—
मुझे देखो।
बीवी का फरमान है कि कुछ नहीं
सबसे पहले मुझे सुनो
उधर दफ़्तर के मसले को सुलझाने में
लेटे जिस्म के दिमाग़ में मचा घमासान है।
खाली वक़्त में भी कहाँ आराम है!
फिर चाय-नाश्ते को पेट में ग़र्क करने का
पेंडिंग काम भी तो निबटाना है!
और खा-पीकर दोपहर में सो जाना भी
तो बहुत बड़ा काम है—
जिसे करने की ज़िम्मेदारी भी तो
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी हीं है।
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काश! इन सारे कामों को सँभालने के लिए
ऑफ़िस की तरह घर पर भी
कोई मेरा पीए होता!
जिसे सारे काम सौंप कर
मैं निश्चिंत रहता.
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लब्बोलुआब कि बैक-टू-बैक
मल्टीटास्किंग करते-करते
जी हलकान है।
दिल-ओ-दिमाग़ परेशान है,पशेमान है,
खाली वक़्त में भी कहाँ आराम है!
~राजीव रंजन प्रभाकर.
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