शब्द: ध्वनि से भाव तक
शब्द के विषय में क्या कहा जाय! शब्द ही सब कुछ है। वेद को तो ‘शब्दब्रह्म’ कहा गया है। लेकिन कब? जब शब्द भाव का आकार ग्रहण कर लेता है। यही तब मंत्र कहलाता है, जब भाव के साथ शब्दों का संयोजन हो जाता है। तब शब्द का सार्थक होना भी आवश्यक नहीं रह जाता है—शाबर मंत्र का मर्म यही है।
अधरों के स्पर्श से जो मुख से उच्चरित होता है, वह शब्द है। उसका नाश नहीं हो सकता, क्योंकि वह ‘स्वर’ से न बनकर ‘अक्षर’ से निर्मित होकर उच्चरित होता है। क्या हम ‘शब्द’ का यही स्वर किसी वातावरण में उच्चारण करके उस शब्द को नष्ट किया जा सकता है? नहीं।
हाँ, वर्णों के समूह से जो कागज पर लिखित है, वह मेरे विचार से वह शब्द यथार्थ में न होकर उसकी ‘छाया’ है, ‘स्मृति’ है। ठीक उसी प्रकार जैसे वायुमंडल में उच्चरित हो रहे शब्दों को कोई टेप-रिकॉर्डर में कैद कर ले। अक्षर एवं वर्ण में वस्तुतः कोई अंतर नहीं है—क्योंकि एक अनित्य ध्वनि का संकेत है और दूसरा कागज पर अंकित उसका दृश्य रूप।
मेरे विचार से आज तक विज्ञान उस स्तर की प्रगति नहीं कर पाया है कि गीता में श्रीकृष्ण ने जो अर्जुन के प्रति बातें कहीं, उन्हें आज किसी यंत्र की सहायता से उसी स्वर में पुनः सुनाया जा सके।
क्या किसी चिंतन या क्रोध में किसी को हम आशीर्वाद दे सकते हैं?
नहीं। क्रोध में हम किसी को दुर्वचन या गाली ही देते हैं; अथवा आशीर्वाद देने की क्षमता रखने वाला क्रोधवश शाप दे सकता है।
शब्द की सत्ता का आभास मात्र इसी से लिया जा सकता है कि रामायण या महाभारत—दोनों महान ग्रंथों का कारक ‘शब्द’ ही हैं।
मेरे विचार से शब्द एक प्रकार का ऊर्जा पिण्ड है।
यदि वह ऊर्जा नकारात्मक है तो उसका प्रभाव हानिकारक होगा तथा यदि वह सकारात्मक ऊर्जा से निर्मित है तो उसका प्रभाव मंगलकारी होगा। आशीर्वाद इसी सकारात्मक ऊर्जा का एक रूप है।
— R. R. P.
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