आराम की महत्ता

जीवन में जितना महत्त्व कर्म का है, उतना ही महत्त्व आराम का भी है। यद्यपि हमारे शास्त्रों एवं व्यवहार में कर्म की अपेक्षा आराम को उतना गौरव प्राप्त नहीं है, तथापि यह निर्विवाद सत्य है कि कोई भी व्यक्ति निरंतर कार्य नहीं कर सकता। श्रम के उपरांत शरीर और मन दोनों को विश्राम की आवश्यकता होती है।
इसलिए आराम करना कोई दोष नहीं है, बशर्ते वह आलस्य का पर्याय न बन जाए। विश्राम का उद्देश्य नई ऊर्जा का संचार करना है, न कि कर्म से विमुख कर देना। प्राणिमात्र—चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो अथवा अन्य कोई जीव—सभी को अपने अस्तित्व और संतुलन के लिए विश्राम की आवश्यकता होती है।
अब ज़रा आराम के सोपानों पर भी दृष्टि डालिए—
खड़े रहने की अपेक्षा बैठने में अधिक आराम मिलता है।
बैठने की अपेक्षा लेटने में अधिक आराम मिलता है।
लेटने की अपेक्षा करवट लेकर सोने में अधिक आराम मिलता है।
और सोने के बाद तो मानो बाह्य जगत का बोध ही समाप्त हो जाता है।
यही क्रम यह संकेत देता है कि यदि मनुष्य केवल आराम के पीछे चलता रहे, तो उसकी कोई सीमा नहीं रह जाती। आराम की चाह जितनी पूरी होती जाती है, उतनी ही बढ़ती भी जाती है। इसलिए विवेक इसी में है कि आराम को साधन बनाएँ, साध्य नहीं।
आखिर आराम सबको इतना प्रिय क्यों लगता है?
शायद इसलिए कि 'आराम' शब्द सुनते ही मन को सहज शांति का अनुभव होने लगता है। वैसे एक विनोदपूर्ण कल्पना यह भी की जा सकती है कि 'आराम' में 'राम' विराजमान हैं; इसलिए मन बार-बार उसी की ओर आकर्षित होता है। किंतु यदि आराम ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाए, तो वही स्थिति अंततः मनुष्य के कर्म, पुरुषार्थ और प्रगति पर विराम लगा देती है।
अतः जीवन का सूत्र यही है— "कर्म में परिश्रम हो, विश्राम में मर्यादा हो और आलस्य से सदा दूरी हो।"

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