मिलना नहीं है--
मिलना नहीं है;
सिर्फ साथ-साथ चलना है----
कैसे?
जैसे पटरी के दो रेल की तरह।
मिलना नहीं है;
सिर्फ साथ-साथ चलते हुए एक दूसरे को देखना है----
कैसे?
जैसे ज़मीं और आसमान की तरह।
मिलना नहीं है;
सिर्फ साथ-साथ रहना है----
कैसे?
जैसे दिन और रात की तरह।
जैसे दोनों ऑंखों की तरह।
जैसे दोनों कानों की तरह।
जैसे पेट और पीठ की तरह।
जैसे शरीर और आत्मा की तरह।
***
मिलना क्यों नहीं है?
क्योंकि---
क्षण भर के मिलने का सुख का
विषाद के रूप में बदलना तय है
क्योंकि---
मिलने के सुख से कहीं अधिक सुखदाई है एक दूसरे की उपस्थिति का अहसास
क्योंकि---
मिलने से
जो बनता है वह mixture या फिर compound होता है
जो elements (तत्व) के महत्व को कम कर देता है।
~राजीव रंजन प्रभाकर.
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