मौन

चुप रहना मौन नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे अकेलापन एकांत नहीं है। जैसे चुप रहकर ही मौन का अभ्यास किया जा सकता है, अतः चुप रहना भी प्रायः हितकर ही है।

चुप रहने में हमारी आंतरिक वृत्तियाँ, भीतर का कोलाहल, उद्दिग्नता और शोर जारी रहता है; बस उसे व्यक्त करने के लिए प्रस्तुत होने वाले अक्षरों के कपाट को जानबूझकर या परिस्थितिवश बंद रखा जाता है।

उदाहरण के लिए, अब हम किसी मीटिंग में बैठे हैं और अपने बॉस की डाँट-फटकार और अनर्गल प्रलाप को चुप रहकर सुनने को विवश हैं, जबकि भीतर हमारे अपने प्रति जो आक्रोश के भाव उत्पन्न होते हैं, उनसे चित्त आंदोलित एवं क्षुब्ध होता रहता है। बैठक समाप्त होते ही मन का वह उद्वेग बाहर आ जाता है।

हम किसी बड़े हास्पीटल में देखते हैं- यत्र-तत्र "Silence Please" का बोर्ड लगा रहता है. यहाॅं हम चुप तो रहते हैं किन्तु भीतर मरीज़ के स्वास्थ्य आदि समस्या को लेकर चित्त अशांत रहता है. परिस्थितिवश हम चुप रहते हैं, यह बाहर की मांग है हमारे भीतर की नहीं. अर्थात् यह मौन नहीं है. 

मौन इससे सर्वथा भिन्न है। इस अवस्था में मन का व्यापार शून्य और शांत रहता है। तब चुप रहने की आवश्यकता हीं नहीं होती। ऐसी दशा में मन को हम एक दर्पण की तरह उपयोग कर सकते हैं, जिसमें अपने चित्त का चेहरा साफ-साफ दिखाई देता है—ठीक उसी प्रकार जैसे शांत-स्थिर जल में कोई अपना मुख देख ले।
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मौन-साधना भी कोई आसान नहीं है। बाहरी स्थितियाँ हमारे मनोवेग को तीव्र गति से बढ़ाती रहती हैं। 
मौन अपने भीतर की आंतरिक ऊर्जा को संचित रखने में परम सहायक है।

जब हम स्वयं को “वक्ता” समझने के बजाय “द्रष्टा” समझने का अभ्यास बढ़ाते जाएँ, तो परिस्थितियों के प्रति हमारा response धीरे-धीरे mature होता जाएगा और बोलने की इच्छा का भी धीरे-धीरे लोप होता जाएगा। जब बोलने की इच्छा में कमी होने लगेगी, तो वह मौन की अवस्था की ही प्राप्ति होगी।
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मौन आनंद एवं शांति का उत्पादक है और बहुलांश में विपत्ति का निवारक भी, जो निष्प्रयोजन अथवा अत्यधिक वाणी के दुरुपयोग से उत्पन्न होता है। 
कहा भी गया है—“आनंद” और “शांति” मौन रूपी वृक्ष के हीं फल और फूल हैं। 
अत्यधिक बोलने से तोता-मैना आदि अनावश्यक उलझनों में फँस जाते हैं; वहीं बगुला शांत रहकर जाने से पकड़ा नहीं जाता।

संस्कृत में एक श्लोक प्रसिद्ध है—

मौनं सर्वार्थसाधनम्।

मौन वास्तव में अपने भीतर लौटने का एक साधन है; और शायद इसीलिए, जितना हम बोलने से बचते हैं,उतना ही अपने भीतर को सुन पाते हैं।
      ~राजीव रंजन प्रभाकर

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