परिचय
परिचय
पहले लोग अपना परिचय अपने नाम के साथ उस देश, प्रदेश अथवा स्थान का नाम लेकर देते थे, जहाँ से उनका संबंध होता था। साथ ही, अपने पिता का नाम लेना भी परिचय का एक आवश्यक अंग माना जाता था। दक्षिण भारत में न्यूनाधिक रूप से यह परंपरा आज भी देखने को मिलती है।
उदाहरण के लिए, पूर्व प्रधानमंत्री स्व. पी. वी. नरसिंह राव का नाम लें। उनके नाम में ‘पी. वी.’ उनके पिता के नाम का संकेत करता है। वर्तमान प्रधानमंत्री का पूरा नाम भी नरेंद्र दामोदरदास मोदी है, जिसमें उनके पिता का नाम ‘दामोदरदास’ सम्मिलित है।
पता नहीं, हमारे देश में धीरे-धीरे यह परंपरा क्यों क्षीण होती चली गई। परिचय में पिता के नाम के साथ अपने कुल, स्थान अथवा किसी विशिष्ट पहचान का उल्लेख करना भी कभी हमारी सामाजिक परंपरा का हिस्सा रहा होगा। सम्भव है, प्राचीन काल में लोग अपने परिचय के साथ अपने राजा अथवा राज्य का नाम लेकर उसकी जयघोष भी करते रहे हों।
इसी क्रम में वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग स्मरण हो आता है।
हनुमानजी अशोक वाटिका में निर्भीक होकर फल खा रहे थे। केवल फल खाकर ही वे संतुष्ट नहीं हुए; फल से लदे वृक्षों को भी जड़ से उखाड़कर इधर-उधर फेंकते जा रहे थे। फलतः अशोक वाटिका की ऐसी दुर्दशा हुई कि राक्षसों के अनेक प्रयासों के बाद भी वे हनुमानजी को पकड़ नहीं सके।
अंततः राक्षसों का दल उन्हें पकड़ने के लिए आया। स्वाभाविक था कि वे पहले उनका परिचय जानना चाहते।
जानते हैं, हनुमानजी ने अपना परिचय उन राक्षसों को किस प्रकार दिया?
हनुमानजी कहते हैं—
दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य
रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
हनूमान् शत्रुसैन्यानां
निहन्ता मारुतात्मजः॥
न रावणसहस्रं मे
युद्धे प्रतिबलं भवेत्।
शिलाभिस्तु प्रहरतः
पादपैश्च सहस्रशः॥
अर्थात्—
“मैं कोसलराज श्रीराम का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान है और मैं मारुतात्मज—वायु का पुत्र हूँ। मैं शत्रु-सैन्य का संहार करने वाला हूँ। युद्ध में रावण जैसे हजारों योद्धा भी मेरे सामने प्रतिद्वंद्वी बनकर नहीं टिक सकते। यदि मैं शिलाओं और हजारों वृक्षों से प्रहार करने लगूँ, तो मेरा सामना करना उनके लिए संभव नहीं होगा।”
वाह! क्या परिचय है!
आज हमसे यदि कोई हमारा परिचय पूछे तो हम अपना नाम, पद, निवास, माता-पिता का नाम और अपनी उपलब्धियाँ बताते हैं। लेकिन हनुमानजी ने अपने परिचय में अपना नाम ही नहीं, अपने स्वामी, अपने पिता और अपनी सामर्थ्य—चारों का परिचय एक साथ दे दिया।
और वह भी तब, जब सामने अपने शत्रु खड़े हों!
हनुमानजी के इस परिचय में न कोई अहंकार है, न अपनी शक्ति का अनावश्यक प्रदर्शन। वे केवल इतना बता रहे हैं कि वे किसके दास हैं, किसके पुत्र हैं और किस सामर्थ्य के स्वामी हैं। यही उनके परिचय की सबसे बड़ी विशेषता है।
अब जरा कल्पना कीजिए—ऐसा परिचय सुनकर उन राक्षसों की क्या दशा हुई होगी? जिनके सामने अभी-अभी एक वानर ने उनकी पूरी अशोक वाटिका उजाड़ दी हो, और वही वानर अब निर्विकार भाव से अपना परिचय देते हुए कह रहा हो कि रावण के सहस्र योद्धा भी युद्ध में उसके सामने टिक नहीं सकते!
निश्चय ही उनका कलेजा मुँह को आ गया होगा!
ऐसे हैं कोसलेन्द्र श्रीराम के दास—मारुतात्मज हनुमान!
श्रीराम जय राम जय जय राम।
— R.R.P.
Comments