ऊपर से रामायण मगर भीतर से पक्का महाभारत हूॅं
फाइलों को ऊपर-ऊपर से पढ़ता हूॅं लेकिन भीतर-भीतर हीं तौलता हूॅं,
मगर लगता है जैसे नींद में सोया हूॅं-खोया हूॅं.
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घर में अज़ीज़ों से घिरा हूॅं,
मगर तबियत ऐसी जैसे कोई मिटिंग में हूॅं.
बिछावन पर लेटा हूॅं,
मगर लगता है आफिस में बैठा हूॅं.
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हूॅं मुखातिब तेरी ओर,
मगर पाॅंव गामजन हैं उसकी ओर.
रिंद की सीरत में ख़िज़्र दिखता हूॅं,
हूॅं इधर का मगर उधर का लगता हूॅं.
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पूजा-इबादत में ऑंखें मूंद कर माला-तस्बीह फेरता हूॅं,
मगर बगल से कौन गुजरा उसका भी हिसाब रखता हूॅं.
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लुब्ब-ए-लुबाब कि जहॉं हूॅं वहीं से नदारद हूॅं;
जिंदा वक़्त के क़त्ल ओ ग़ारत में पारंगत हूॅं.
या कहिए
ऊपर से रामायण
मगर भीतर से पक्का महाभारत हूॅं.
~राजीव रंजन प्रभाकर.
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