अपना और पराया


अपना” शब्द कितना मोहक है! अपना देश, अपना राज्य, अपना जिला, अपना गाँव, अपना टोला, अपना घर, अपना आँगन, अपना कमरा, अपना बेड, अपना बिस्तर, अपनी माँ, अपने भाई, अपनी बहन, अपनी माँ, अपने बाबूजी, अपना बेटा, अपनी बेटी, अपना दोस्त, अपनी साइकिल, अपना ऑफिस, अपना स्टाफ, अपना चेयर… मनुष्य की ‘अपना’ की लिस्ट तो endless है।

मेरी दृष्टि में इसी अपनापन के चलते आदमी-आदमी के बीच अपने और पराये का भेद उत्पन्न हुआ होगा और व्यवहार में भेदभाव की शुरुआत का कारण बना होगा। और यह भेदभाव बड़ा ही स्वाभाविक है। हम चाहें तो भी इस भाव से मुक्त हो नहीं सकते। यह भाव उच्च से उच्च कोटि के साधु-महात्माओं में भी होता होगा—मेरा अनुमान है। कम-से-कम अपने शरीर की रक्षा तो करते ही हैं।

मेरे विचार में “अपना” होने के आधार पर भेद करना तब तक शायद उचित ठहराया जा सकता है, जब तक कि उसे पाने का बराबर का हकदार कोई पराया भी हो। इससे आगे नहीं।

जैसे ही किसी चीज़ को पाने का अधिक हकदार कोई “अपना” के बजाय पराया उपस्थित हो, तब “अपना” को प्राथमिकता प्रदान करना व्यक्ति को अपराधबोध से ग्रसित कर देता है। यद्यपि वह तरह-तरह की युक्तियों और तर्कों के आधार पर ऐसे भेदभाव को जायज़ ठहराता है।

लेकिन जो व्यक्ति मोह रूपी रोग से ग्रस्त हो, उसके लिए ऊपर की बात लिखने का कोई लाभ नहीं है। वह तो भेदभाव क्या अपने के लिए या अपने स्वार्थ के लिए गंभीर से गंभीर अपराध, जिसमें बेईमानी से लेकर पैसे और जाति के बल पर पक्षपात, आदि नाना प्रकार का कुकृत्य हो—उसके लिए कोई मायने नहीं रखता।

“अपना” वाला भाव भ्रष्टाचार के मूल में है। विश्व में सबके हाहाकार के मूल में यही है।
अपनापन जब तक स्नेह है, तब तक मानवीय है; जब वह न्याय पर हावी हो जाता है, तब पक्षपात बन जाता है; और जब पक्षपात कर्तव्य को निगल जाता है, तब भ्रष्टाचार जन्म लेता है।


— R.R.P.

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