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Showing posts from September, 2026

जो इच्छा करिहौं मन माहिं हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहिं

इच्छारहित जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। मेरे विचार से तो यह संभव ही नहीं है। जब तक जीवन है, इच्छाओं की श्रृंखला का बढ़ना आम बात है। इच्छा का उत्पन्न होना कोई बुरी बात नहीं है। इच्छा के अनुरूप बिना विवेक के निदर्शन में कोई कार्य करना, बिना सामर्थ्य का विचार किए कुछ करने को उद्यत रहना तथा इच्छा की लगातार पूर्ति होने की स्थिति में उसका आसक्ति में बदल जाना—ये ठीक नहीं हैं। So, birth of desire is natural. In fact, it is the product of our interaction with the environment and surroundings. One important thing, however, is how we manage those desires that continuously spring, grow and then either die or subside within our being. In my opinion, those who do not let their desires take birth in their being must be great—or must have been great. I have not seen such people till now, nor have I ever met such a personality. I feel your competence lies in the fact of how skillfully you handle your desires with the capacity or resources at your command. The people who don't have any desire w...

प्रशंसा — निंदा — स्तुति — चापलूसी

प्रशंसा — निंदा — स्तुति — चापलूसी जब तक जीवन है, प्रशंसा, आलोचना, निंदा, स्तुति आदि में ही चला जाता है—कुछ सुनकर, कुछ कहकर और कुछ करके। व्यक्ति का स्वभाव है कि वह प्रशंसा एवं स्तुति से प्रसन्न होता है, जबकि आलोचना एवं निंदा से प्रायः नहीं तो कम-से-कम भीतर-ही-भीतर क्रोधित अवश्य हो उठता है। कभी-कभी तो अपनी थोड़ी-सी भी निंदा सुनकर कहने वाले से बैर तक हो जाता है, जो शीघ्र ही शत्रुता में परिवर्तित हो जाता है। इसमें भी मेरी दृष्टि से सबसे अधिक रोचक ‘चुगली’ है। इसे पारिभाषिक भाषा में पिशुनता कहा गया है। यह जानना रोचक हो सकता है कि चुगली की ‘नहीं’ जाती, बल्कि ‘खाई’ जाती है। यदि ऐसा न होता तो ‘चुगलखोर’ शब्द अस्तित्व में नहीं आता। चुगली किसी के छोटे-बड़े, कुशल-अकुशल अथवा निम्नस्तरीय कार्यों को दूसरे को सुनाना है। सुनाकर मज़ा लेना और इस प्रकार उसे एक कान से दूसरे कान तक पहुँचाना ही तो चुगली है। यह जानना भी interesting लगता है कि जिस प्रकार भोजन को हाथ ही मुँह को खिलाता है, इसके विपरीत चुगली मुँह कान को खिलाता है। इस प्रकार चुगली का कर्ता मुँह है और भोक्ता कान। चुगली करने/खाने का एक स्वभाव-सा बन ...