प्रशंसा — निंदा — स्तुति — चापलूसी

प्रशंसा — निंदा — स्तुति — चापलूसी
जब तक जीवन है, प्रशंसा, आलोचना, निंदा, स्तुति आदि में ही चला जाता है—कुछ सुनकर, कुछ कहकर और कुछ करके। व्यक्ति का स्वभाव है कि वह प्रशंसा एवं स्तुति से प्रसन्न होता है, जबकि आलोचना एवं निंदा से प्रायः नहीं तो कम-से-कम भीतर-ही-भीतर क्रोधित अवश्य हो उठता है। कभी-कभी तो अपनी थोड़ी-सी भी निंदा सुनकर कहने वाले से बैर तक हो जाता है, जो शीघ्र ही शत्रुता में परिवर्तित हो जाता है।
इसमें भी मेरी दृष्टि से सबसे अधिक रोचक ‘चुगली’ है। इसे पारिभाषिक भाषा में पिशुनता कहा गया है। यह जानना रोचक हो सकता है कि चुगली की ‘नहीं’ जाती, बल्कि ‘खाई’ जाती है। यदि ऐसा न होता तो ‘चुगलखोर’ शब्द अस्तित्व में नहीं आता।
चुगली किसी के छोटे-बड़े, कुशल-अकुशल अथवा निम्नस्तरीय कार्यों को दूसरे को सुनाना है। सुनाकर मज़ा लेना और इस प्रकार उसे एक कान से दूसरे कान तक पहुँचाना ही तो चुगली है।
यह जानना भी interesting लगता है कि जिस प्रकार भोजन को हाथ ही मुँह को खिलाता है, इसके विपरीत चुगली मुँह कान को खिलाता है। इस प्रकार चुगली का कर्ता मुँह है और भोक्ता कान।
चुगली करने/खाने का एक स्वभाव-सा बन जाता है। इसके बिना इसमें रस लेने वाले को अच्छे-से-अच्छा भोजन, अच्छी-से-अच्छी बातें और अच्छा-से-अच्छा माहौल भी नहीं भाता। वह अपने स्वभाव के अनुरूप माहौल न पाकर या तो वहाँ से चला जाता है या अपने स्वभाव के अनुरूप किसी अन्य स्वभाव वाले व्यक्ति को उसी माहौल में तलाश कर एक-दूसरे के मुँह और कान को कर्ता और भोक्ता बना देता है।
व्यक्तित्व की जितनी हानि चुगली करने/खाने से होती है, उतनी कदाचित् अन्य मानसिक दोषों से भी नहीं होती है।
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अब प्रशंसा की बात करते हैं.
प्रशंसा प्रायः सभी को अच्छी लगती है। प्रशंसा प्रसन्नतादायक होती है। प्रशंसा सुनकर आत्ममुग्ध हो जाना भी देखा जाता है। आत्ममुग्धता अहंकार को उत्पन्न करती है तथा जिस तत्त्व की प्रशंसा की जाती है, वह तत्त्व भी व्यक्ति के भीतर अहंकार का कारण बन जाता है।
किसी के अच्छे गुणों और कार्यों की अलग-अलग प्रशंसा करने में हम प्रायः कंजूसी करते हैं। सोशल मीडिया के इस जमाने में सभी स्वयं को आत्ममुग्ध दिखाते हैं। सभी स्वयं को ज्ञान का भंडार और गुणों की खान समझते हैं। अपनी प्रशंसा के अतिरिक्त किसी अन्य की सुनने में किसी को रुचि नहीं है, खासकर यदि किसी अन्य की किसी के सामने की जाए। दूसरे की प्रशंसा अब लोकाचार के तहत सुनी जाती है.
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किसी के गुण, रूप एवं प्रभाव की प्रशंसा करनी चाहिए, यदि उसका व्यक्तित्व ऐसा है या कृतित्व ऐसा है। किन्तु झूठे आडंबर के रूप में प्रशंसा नहीं होनी चाहिए। वहाँ भी हमलोग प्रायः कंजूसी दिखाते हैं। कभी-कभी प्रशंसा करने में लोगों को पेट में दर्द जैसा महसूस पड़ता है। वे किसी की प्रशंसा कर ही नहीं सकते। ऐसे भी लोग कम नहीं हैं, जिनके मुँह से किसी के लिए तारीफ़ का एक शब्द भी नहीं निकलता है।
वहीं अपने बच्चे, अपनी उपलब्धि, अपनी सम्पत्ति की जब बात चलती है तो सहस्त्रों मुॅंह से बखान करते नहीं अघाते हैं।
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मेरे विचार से प्रशंसा व्यक्ति की नहीं, उसके कार्यों की की जानी चाहिए। यह व्यक्ति-परक न होकर कार्यपरक हो। तथापि, प्रशंसा से किसी हित-साधन की मंशा न उत्पन्न हो। अन्यथा वही प्रशंसा चापलूसी में बदल जाती है।
सामने में की गई आवश्यकता से अधिक प्रशंसा, जो स्वार्थ-सिद्धि के लिए की जाती है, वह चापलूसी है। यह व्यक्ति को दीन एवं मूल्यहीन बना देती है।
जैसे-जैसे आपको अपना वास्तविक मूल्य पता चलता है, वैसे-वैसे प्रशंसा, निंदा, चापलूसी, स्तुति—सब बेकार लगने लगेंगे। आपको तब कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
~राजीव रंजन प्रभाकर 

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