समाज : बदलता स्वरूप, बदलती भूमिका
समाज : बदलता स्वरूप, बदलती भूमिका
पहले समाज का व्यक्ति के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। व्यक्ति के निजी जीवन तक में समाज किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपना हस्तक्षेप रखता था। व्यक्ति क्या करे, कैसे रहे, किससे संबंध रखे—इन सब पर समाज की दृष्टि रहती थी। इतना ही नहीं, व्यक्ति के लिए यह भी महत्वपूर्ण होता था कि “समाज क्या कहेगा?”
जैसे-जैसे व्यक्ति आर्थिक रूप से सशक्त होता गया, उस पर सामाजिक बंधन ढीले पड़ते गए। उसे इस बात की परवाह कम होती गई कि समाज उसके बारे में क्या सोचेगा या क्या कहेगा। कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के धीरे-धीरे कमजोर होने और उसके स्थान पर अन्य आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने से भी सामाजिक संरचना प्रभावित हुई। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने व्यक्ति को समाज की परंपरागत निर्भरता से काफी हद तक मुक्त कर दिया।
फलतः व्यक्ति का निजी जीवन धीरे-धीरे अधिक स्वतंत्र होता गया। जातिगत बंधन, सामाजिक मान्यताएँ, सामाजिक दायित्व और समाज की अपेक्षाएँ—इन सबका व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता गया। जाति की सीमाओं से बाहर विवाह की बढ़ती प्रवृत्ति, नौकरी अथवा आजीविका के लिए अपने गाँव और पारंपरिक सामाजिक परिवेश से दूर चले जाना, पैतृक गाँव से केवल कभी-कभार संपर्क रह जाना तथा बदलती जीवन-शैली—ये सभी कमजोर पड़ते सामाजिक संबंधों के संकेत हैं।
अब व्यक्ति को समाज की निंदा या असहमति से भी पहले जैसा विशेष फर्क नहीं पड़ता, विशेषकर तब जब वह स्वयं को आर्थिक रूप से सक्षम पाता है। जिस समाज की स्वीकृति कभी व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी, आज उसी समाज की असहमति को वह कई बार सहजता से स्वीकार कर लेता है।
यहाँ तक कि व्यक्ति के अपने पारंपरिक समाज से बाहर निकलकर नौकरी या जीविका के लिए किसी दूसरे शहर में आ जाने के बाद भी वहाँ रहने वाले लोगों का समुदाय आवश्यक रूप से वास्तविक अर्थ में समाज नहीं बन पाता।
ऐसे लोग एक-दूसरे के मित्र बन सकते हैं, सुख-दुःख में साथ भी खड़े हो सकते हैं; लेकिन क्या वे वास्तव में एक-दूसरे के जीवन से उतने जुड़े होते हैं, जितना पारंपरिक समाज के लोग हुआ करते थे? पड़ोसी के घर क्या हो रहा है, कौन किस कठिनाई से गुजर रहा है, किसे किस समय सहायता की आवश्यकता है—इन बातों की जानकारी और चिंता अब पहले जैसी सहज नहीं रह गई है। आपके पास रहने वाला व्यक्ति आपका पड़ोसी तो हो सकता है, परिचित या मित्र भी हो सकता है, किंतु केवल एक ही अपार्टमेंट में रहने मात्र से वह आपका समाज नहीं बन जाता।
पारंपरिक समाज की चर्चा यहीं तक।
अब प्रश्न यह है कि क्या आज समाज नाम की संस्था वास्तव में कमजोर पड़ गई है?
वास्तविक विवेचना करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि समाज का स्वरूप और उसकी भूमिका दोनों बदल गए हैं। आज समाज का एक बड़ा और अत्यंत प्रभावशाली रूप सोशल मीडिया पर दिखाई देता है—जहाँ असंख्य लोग किसी घटना पर तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं, अपनी राय व्यक्त करते हैं और कुछ ही क्षणों में किसी घटना को व्यापक सार्वजनिक चर्चा का विषय बना देते हैं।
यह नया समाज वास्तविक जीवन में एक-दूसरे के साथ खड़े होने वाला समाज कम और आभासी रूप से प्रतिक्रिया देने वाला समाज अधिक दिखाई देता है। किसी के साथ आपराधिक कृत्य हो रहा हो, किसी की हत्या हो रही हो, किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार हो रहा हो अथवा कोई अन्य गंभीर घटना घट रही हो—कई बार ऐसी घटनाओं में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने, पीड़ित की सहायता करने या आवश्यक सहायता बुलाने के बजाय घटना को मोबाइल में रिकॉर्ड कर उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
यहाँ तकनीक स्वयं दोषी नहीं है। वही मोबाइल किसी पीड़ित की सहायता के लिए सूचना देने, अपराध का प्रमाण सुरक्षित रखने अथवा लोगों को सचेत करने का माध्यम भी बन सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब दूसरे के दुःख और संकट को सहायता का अवसर मानने के बजाय तमाशे या वायरल सामग्री में बदल दिया जाता है।
यहीं आधुनिक समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
पहले समाज व्यक्ति के निजी जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप करता था। वह कई बार व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता था, उसकी पसंद-नापसंद पर अपनी मान्यताएँ थोपता था और “लोग क्या कहेंगे” के दबाव में उसे बाँधकर रखता था। लेकिन उसी समाज में संकट के समय पड़ोसी के घर पहुँचना, किसी की बीमारी में साथ खड़ा होना, विवाह अथवा मृत्यु जैसे अवसरों पर सामूहिक रूप से उपस्थित होना और आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करना भी सामाजिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।
आज व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र है। यह स्वतंत्रता निश्चय ही सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण पक्ष है। लेकिन प्रश्न यह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ने के साथ क्या उसकी सामाजिक जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़ी है?
यदि उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो हमें समाज के बदलते स्वरूप पर पुनर्विचार करना होगा।
समाज का अर्थ केवल लोगों की भीड़ नहीं है। समान स्थान पर रहने वाले लोगों का समूह भी अपने आप समाज नहीं बन जाता। समाज तब बनता है जब उसमें संबंध, संवेदना, परस्पर उत्तरदायित्व और आवश्यकता के समय एक-दूसरे के लिए खड़े होने की भावना हो।
सोशल मीडिया पर किसी घटना पर टिप्पणी करना आसान है; किसी अनजान व्यक्ति की सहायता के लिए आगे बढ़ना कठिन। किसी घटना को वायरल कर देना आसान है; उसे रोकने के लिए जोखिम उठाना कठिन। किसी के दुःख पर कुछ शब्द लिख देना आसान है; उसके दुःख में वास्तव में साथ खड़ा होना कठिन।
इसलिए आज आवश्यकता शायद पुराने समाज को उसी रूप में वापस लाने की नहीं है। उसके अनेक बंधन और रूढ़ियाँ समय के साथ समाप्त होना स्वाभाविक था। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति की अर्जित स्वतंत्रता और समाज के प्रति उसके उत्तरदायित्व के बीच एक नया संतुलन स्थापित हो।
क्योंकि अंततः समाज वह नहीं है जो केवल यह बताए कि “सही क्या है और गलत क्या है।”
समाज वह भी है जो सही के पक्ष में खड़ा हो और गलत के सामने आवश्यक समय पर अपनी आवाज उठाए।
जिस दिन हम किसी संकटग्रस्त व्यक्ति के पास पहुँचने से पहले उसका वीडियो बनाने लगेंगे, उस दिन हमारे पास लोगों की भीड़ तो होगी, लेकिन समाज शायद नहीं होगा।
— राजीव रंजन प्रभाकर
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