नींद एक औषधि है

नींद एक औषधि है
भगवान ने नींद के रूप में मनुष्य को एक अनुपम उपहार दिया है। मनुष्य ही नहीं, इस संसार का प्रत्येक जीव अपने-अपने ढंग से इस जैविक क्रिया का अनुभव करता है, जिसे हम नींद कहते हैं।
मानव जीवन की अनेक जैविक क्रियाओं में नींद का अपना एक विलक्षण स्थान है। श्वसन, पाचन, हृदय की धड़कन जैसी अनेक जैविक क्रियाएँ तो निरंतर चलती रहती हैं, किंतु नींद एक ऐसी जैविक अवस्था है, जिसमें सामान्य मनुष्य अपने जीवन के लगभग एक-तिहाई समय तक रहता है। दिन के चौबीस घंटों में लगभग आठ घंटे का यह समय मनुष्य अपने बाहरी संसार से लगभग अलग होकर नींद को समर्पित करता है। इतना ही नहीं, जाग्रत अवस्था में भी जिन कार्यों को हम अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य मानते हैं, उनके लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक ऊर्जा के पुनर्संचयन में नींद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इस दृष्टि से देखें तो नींद केवल विश्राम नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता है।
जिस व्यक्ति को ठीक से नींद नहीं आती, उसके स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। शरीर में थकान बनी रहती है, मन अस्थिर होता है और धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता भी प्रभावित होने लगती है। इसके विपरीत, अच्छी और पर्याप्त नींद के बाद मनुष्य स्वयं को पहले की अपेक्षा अधिक सहज, हल्का और ऊर्जावान अनुभव करता है।
नींद की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वह हमें कुछ समय के लिए हमारे ही जीवन से विराम दे देती है।
मान लीजिए, आप किसी दिन बहुत थके हुए हैं। शरीर की थकान के साथ कोई चिंता, कोई दुःख या कोई मानसिक तनाव भी आपको भीतर से परेशान कर रहा है। दिन भर उससे बचने का कोई उपाय नहीं मिलता। आप अपने काम में लगे रहते हैं, लोगों से मिलते हैं, बातचीत करते हैं और सामान्य बने रहने का प्रयास करते हैं। लेकिन रात में जैसे ही नींद आपको अपने आगोश में लेती है, कुछ समय के लिए वह सब पीछे छूट जाता है। न चिंता रहती है, न शोक, न पीड़ा—कम-से-कम उनका बोध तो नहीं रहता।
और आश्चर्य देखिए कि जिस नींद से जागने का हम कभी-कभी प्रयत्न करते हैं, वही नींद कुछ समय बाद हमें स्वयं जगा देती है। आँख खुलती है तो लगता है कि शरीर ने विश्राम पा लिया है और मन किसी सीमा तक फिर से तैयार है—एक और दिन के लिए, एक और संघर्ष के लिए, एक और जीवन के लिए।
नींद हमें केवल थकान से ही नहीं उबारती; वह कुछ समय के लिए दुःख को भी हमसे दूर कर देती है। इस अर्थ में देखें तो नींद निश्चय ही एक औषधि है—ऐसी औषधि, जिसका मूल्य धन से नहीं चुकाया जा सकता और जिसे प्रकृति ने लगभग प्रत्येक जीव के लिए सहज उपलब्ध कराया है।
शास्त्रों में भले ही नींद को इस अर्थ में औषधि न कहा गया हो, लेकिन उसके प्रभाव को देखकर ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति प्रतीत नहीं होती। औषधि रोग से संघर्ष करने में शरीर की सहायता करती है; नींद शरीर और मन को उस संघर्ष के लिए फिर से तैयार करती है।
लेकिन नींद का उद्देश्य केवल सोते रहना नहीं है। नींद के बाद जागना भी उतना ही आवश्यक है। जागकर मनुष्य को फिर अपनी कर्मभूमि में लौटना होता है। शरीर में आई नई स्फूर्ति और मन में उत्पन्न नई चेतना के साथ उसे अपने दायित्वों का निर्वाह करना होता है। जीवन का क्रम शायद इसी प्रकार चलता है—थकना, विश्राम करना, फिर उठना और पुनः कर्म में प्रवृत्त हो जाना।
यहीं से नींद मुझे जीवन का एक छोटा-सा रूपक भी लगने लगती है।
नींद में हम कुछ समय के लिए संसार से जैसे विलग हो जाते हैं और जागने पर फिर उसी संसार में लौट आते हैं। तब मन में सहज ही प्रश्न उठता है—क्या जन्म और मरण के बिना किसी जीव की कल्पना की जा सकती है?
शायद नहीं।
नींद से जागरण और जागरण से फिर नींद—यह छोटा-सा दैनिक चक्र हमें जीवन के उस बड़े चक्र की याद दिलाता है, जिसे हम जन्म और मृत्यु के नाम से जानते हैं।
और जन्म-मरण के बिना किसी जीव की कल्पना की जा सकती है?
नहीं, कदापि नहीं।
— राजीव रंजन प्रभाकर

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