घर

यह सिर्फ दो अक्षरों का शब्द सुनते ही मन-मस्तिष्क में एक अनुपम अनुभूति उत्पन्न कर देता है. अंग्रेजी इसे House न कहकर Home कहना उस अनुभूति का बोध कराता है.
       घर का महत्व जितना घर से बाहर जाने में नहीं है उससे क‌ई गुना ज्यादा व्यक्ति के लिए बाहर से घर आने में है. 
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चाहे पशु हो, पक्षी हो, आदमी हो; घर सभी को चाहिए. चाहिए तो चाहिए.पशु के लिए यह घर मांद हो सकता है, पहाड़ की कंदरा हो सकती है, गुफा हो सकता है. पक्षी के लिए घोंसला उसका घर है और सांप के लिए उसका बिल. बन्दर के लिए पेड़ की डाली हीं उसका घर के रूप में आश्रय है.
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 घर का महत्व सापेक्षिक भी है. यदि आप काम के सिलसिले में अपना शहर या गांव का घर छोड़ कर किसी किराये के मकान को आशियाना बनाए हुए हैं तो उस परिस्थिति के अधीन वह किराया का मकान हीं जब तक ऐसी परिस्थिति बनी रहती है वह आपका घर है. यदि आप दो-चार दिनों के लिए हीं सही कार्यवश किसी होटल में टिके हुए हैं तो होटल का वह कमरा जिसमें आप टिके हुए हैं वही आपका उतने दिनों के लिए घर हुआ. 
क्या आपको दिन भर के दौड़ भाग के बाद होटल लौटने का मन नहीं करता है? 
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घर शब्द सुनते ही विश्राम शब्द की याद आती है. स्वयं को सार्वजनिक जीवन से इतर विविध निजी रूपों में अभिव्यक्त करने की आवश्यकता पूर्ति का स्थल हीं शायद घर के नाम से जाना जाता है.
घर से बाहर निकलने के एक समय बाद आपको घर लौटने का मन नहीं करे तो समझिए कुछ गड़बड़ है.
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घर के मोह से साधु-महात्मा भी मुक्त नहीं हैं. घर छोड़ दिया किन्तु हृदय में 'घर' घर किए हुए है अर्थात घर की स्मृति बनी हुई है. जब घर घर किए हुए हीं रहे तो घर क्या और वन क्या!
यदि साधना से स्मृति समाप्त भी हो गई हो तो भी आश्रय के रूप में 'कुटिया' तो बनानी हीं पड़ी.
 और कुटिया घर नहीं है क्या? 
मधुकरी मांग कर आप कुटिया में तो आते हैं, पाते हैं, पैर पसार सोते हैं. 
इससे सिद्ध हुआ कि घर सभी के लिए आवश्यक है; चाहे घर के रूप में वह झोंपड़ी हो, कच्चा या पक्का मकान हो या फिर किसी राजा का महल हो या किसी साधु की कुटिया. सभी प्रकारान्तर से घर हीं तो है.
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औरों का तो पता नहीं किंतु जैसे ही मैं घर से बाहर निकलता हूॅं मुझे घर लौटने की इच्छा का उदय हो जाता है. कार्य की विवशता वश लौट न सकूं ये और बात है. यह प्रायः सभी की इच्छा होती होगी जो इस बात से भी जाहिर होता है कि जैसे हीं कार्यालय काल समाप्ति की ओर अग्रसर होता जाता है मन घर लौटने को उत्सुक रहता है. ऐसे में जब कोई रूकने को कहा जाए तो ऐसा मैसेज सुन कर या पाकर चेहरा विवर्ण हो जाता है और मन विषाद से भर जाता है. भले ही रूक कर काम करना पड़े काम करते करते मन उसी में तल्लीन हो जाता हो तब भी ऐसी उत्सुकता के नाश के बाद भी घर लौटना सुखद अनुभूति हीं प्रदान करता है.
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प्रश्न है कि हमारा असली घर कौन सा है? यह घर जिसमें हम रहते हैं या वह जहॉं हमें अंतिम रूप से विश्राम करना है?
ये भी सापेक्षिक है, है न!

                          ~राजीव रंजन प्रभाकर.


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