ज्ञानी कौन और मूढ़ कौन?
ज्ञानी कौन और मूढ़ कौन? इस संसार में न कोई सदा ज्ञानी रहता है और न सदा मूढ़। सुख-दुःख, परिस्थिति, संगति और समय के प्रभाव से मनुष्य के विचार और मनोभाव निरन्तर बदलते रहते हैं। सम्भव है कि जो व्यक्ति किसी समय अत्यन्त विवेकपूर्ण दिखाई दे, वही किसी दूसरी परिस्थिति में ऐसा निर्णय कर बैठे जिसे देखकर उसके अपने विवेक पर भी आश्चर्य हो। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान शिव के मुख से इसी भाव को कितनी सहजता से व्यक्त कराया है— बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥ अर्थात् मनुष्य की किसी एक समय की अवस्था को देखकर उसे सदा के लिए ज्ञानी या मूढ़ मान लेना उचित नहीं। जिस क्षण जैसी ईश्वरीय प्रेरणा और जैसी परिस्थिति होती है, मनुष्य उसी के अनुरूप आचरण करता है। अपने को ज्ञानी मान लेने के बाद भी मनुष्य से भूल हो सकती है। नारद जैसे मुनि भी मोहग्रस्त हुए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनका ज्ञान मिथ्या था, बल्कि यह कि ज्ञान का होना और प्रत्येक क्षण उसी ज्ञान के अनुरूप व्यवहार कर पाना—दो अलग बातें हैं। विवेक होते हुए भी कभी-कभी मनुष्य उस विवेक को पीछे छोड़ देता है और मोह, कामना,...