स्वयं हीं शिल्प स्वयं हीं शिल्पकार स्वयं हीं औजार

मैं स्वयं हीं शिल्प तथा स्वयं हीं शिल्पकार हूॅं 
और हाॅं; ये भी कि मैं स्वयं हीं छेनी-औजार हूॅं 
एक ऐसा अप्रमाणित शिल्पकार जिसे प्राप्त है 
न कोई शिक्षण,न कोई प्रशिक्षण
न कोई संरक्षण,न कोई आरक्षण
सो शिल्प में जो कमी होनी थी सो है;
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क्योंकि 
शिल्प में कमी का कारण भी कोई और नहीं यह शिल्पकार हीं है.
और कमी ढूंढकर सुधारने की जिम्मेदारी भी इसी शिल्पकार की है.
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एक बात और जो कहना ज़रूरी है
वो ये कि---
'आम ज़िंदगी भी जंग से कोई कम नहीं 
ताहम 
जंग ए ज़िंदगी में 
मै ख़ुद हीं ढ़ाल और ख़ुद हीं तलवार हूॅं.
 ~राजीव रंजन प्रभाकर

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