सम्बन्ध
सम्बन्ध क्या है? मेरे विचार से सम्बन्ध एक प्रकार का अदृश्य बन्धन है। यह रस्सी से निर्मित किसी बन्धन की तरह प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, बल्कि बुद्धि और अनुभूति के माध्यम से इसका बोध होता है। सम्बन्ध की प्रकृति और प्रगाढ़ता के अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता भी किसी-न-किसी सीमा तक प्रभावित होती है। सम्बन्ध जितना प्रगाढ़ होता है, व्यक्ति अपने निर्णयों और व्यवहार में उतना ही दूसरे व्यक्ति अथवा सम्बन्ध से जुड़ी अपेक्षाओं, दायित्वों और हितों का ध्यान रखने लगता है।
सम्बन्धों का संसार
मनुष्य के जन्म लेने और समाज का सदस्य बनने के साथ ही अनेक सम्बन्धों की नींव पड़ जाती है। कुछ सम्बन्ध जन्म के साथ प्राप्त होते हैं, कुछ जीवन में अर्जित किए जाते हैं और कुछ समय, परिस्थिति तथा आवश्यकता के साथ विकसित होते हैं। इस प्रकार सम्बन्धों का संसार निरन्तर विस्तार पाता रहता है।
उदाहरण के लिए, जन्म लेते ही मनुष्य किसी का पुत्र अथवा पुत्री बन जाता है। इस प्रकार माता-पिता और सन्तान का सम्बन्ध स्वतः अस्तित्व में आ जाता है। आगे चलकर भाई-बहन, पति-पत्नी तथा अन्य पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं। फिर आजीविका, सामाजिक सहभागिता और अन्य आवश्यकताओं के कारण अनेक नए सम्बन्ध बनते हैं। मित्र, सहकर्मी, नियोक्ता-कर्मचारी, क्रेता-विक्रेता, दुकानदार-ग्राहक, शिक्षक-विद्यार्थी, पड़ोसी तथा नागरिक-राज्य के सम्बन्ध इसी विस्तृत संसार के विभिन्न रूप हैं।
सम्बन्धों का विस्तार जब परिवार से आगे बढ़ता है, तब वे सामाजिक सम्बन्धों का रूप ले लेते हैं। इन सम्बन्धों के माध्यम से समाज में आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ संचालित होती हैं। धीरे-धीरे यही सम्बन्ध समाज की संरचना को आकार देते हैं और उसे स्थायित्व प्रदान करते हैं।
वस्तुतः सम्बन्धों की उत्पत्ति के मूल में प्रायः पारस्परिक लाभ, हित, सुरक्षा, सहयोग अथवा किसी आवश्यकता की पूर्ति का भाव निहित होता है। उदाहरणार्थ, पति-पत्नी का सम्बन्ध केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि पारस्परिक दायित्वों और साझा जीवन का आधार भी है। इसी प्रकार सामाजिक तथा व्यावसायिक सम्बन्धों में भी किसी-न-किसी रूप में परस्पर निर्भरता विद्यमान रहती है।
समय के साथ सम्बन्धों का स्वरूप बदल भी सकता है। जिस सम्बन्ध का कभी कोई विशेष महत्त्व था, वह परिस्थितियों के बदलने पर गौण हो सकता है; किसी सम्बन्ध का आधार समाप्त हो जाने पर वह टूट भी सकता है। कभी सम्बन्धों के नाम और औपचारिक स्वरूप बने रहते हैं, किन्तु उनमें निहित आत्मीयता अथवा पारस्परिक हित समाप्त हो जाते हैं। इस प्रकार मानव-निर्मित सम्बन्ध सामान्यतः परिवर्तनशील होते हैं; उनकी प्रकृति, प्रगाढ़ता और स्थायित्व परिस्थितियों के अधीन रहते हैं।
एक शाश्वत सम्बन्ध की अवधारणा
किन्तु इन परिवर्तनशील सम्बन्धों के विपरीत एक ऐसा सम्बन्ध भी है, जिसे मैं नित्य अर्थात् शाश्वत मानता हूँ। वह है जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध।
मेरी मान्यता है कि यह सम्बन्ध हमारे भौतिक अस्तित्व के आरम्भ से पहले भी विद्यमान था और शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी बना रहता है। भौतिक शरीर का अन्त हो सकता है, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से जीवात्मा को शरीर से भिन्न और शाश्वत माना जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध किसी सांसारिक आवश्यकता, पारस्परिक लाभ अथवा सामाजिक व्यवस्था पर आधारित नहीं है; वह अस्तित्व की मूल प्रकृति से जुड़ा हुआ है।
इस सम्बन्ध को समझने के लिए यह विचार महत्त्वपूर्ण है कि हमारा भौतिक अस्तित्व समाप्त हो जाने की कल्पना करने पर भी आत्मा के अस्तित्व का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता। यद्यपि इस विषय में विभिन्न दार्शनिक मत हैं, मेरी अपनी मान्यता है कि जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध नित्य है। दोनों के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए उनके पारस्परिक सम्बन्ध पर विचार करना आवश्यक है।
यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि जीवात्मा और परमात्मा की एकता का अर्थ विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं में अलग-अलग हो सकता है। अद्वैत वेदान्त दोनों की तात्त्विक एकता पर बल देता है, जबकि अन्य वेदान्त परम्पराएँ उनके सम्बन्ध को भिन्न रूप में समझाती हैं। मेरा विचार इस विषय में जीवात्मा और परमात्मा के मूलभूत आध्यात्मिक सम्बन्ध की स्वीकृति पर आधारित है।
अतः मेरे लिए सम्बन्धों के दो व्यापक आयाम हैं—एक, वे मानवीय सम्बन्ध जो जन्म, आवश्यकता, सामाजिक व्यवस्था और परिस्थितियों से निर्मित होकर बदलते रहते हैं; और दूसरा, वह आध्यात्मिक सम्बन्ध जिसे मैं जीवात्मा और परमात्मा के बीच नित्य मानता हूँ।
सम्बन्धों के इस व्यापक संसार पर विचार करते हुए मेरा निष्कर्ष यही है कि जहाँ लौकिक सम्बन्धों का स्वरूप और स्थायित्व परिवर्तनशील है, वहीं जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध मेरी दृष्टि में शाश्वत है।
~राजीव रंजन प्रभाकर
Comments