ज्ञानी कौन और मूढ़ कौन?

ज्ञानी कौन और मूढ़ कौन?
इस संसार में न कोई सदा ज्ञानी रहता है और न सदा मूढ़। सुख-दुःख, परिस्थिति, संगति और समय के प्रभाव से मनुष्य के विचार और मनोभाव निरन्तर बदलते रहते हैं। सम्भव है कि जो व्यक्ति किसी समय अत्यन्त विवेकपूर्ण दिखाई दे, वही किसी दूसरी परिस्थिति में ऐसा निर्णय कर बैठे जिसे देखकर उसके अपने विवेक पर भी आश्चर्य हो।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने भगवान शिव के मुख से इसी भाव को कितनी सहजता से व्यक्त कराया है—
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥
अर्थात् मनुष्य की किसी एक समय की अवस्था को देखकर उसे सदा के लिए ज्ञानी या मूढ़ मान लेना उचित नहीं। जिस क्षण जैसी ईश्वरीय प्रेरणा और जैसी परिस्थिति होती है, मनुष्य उसी के अनुरूप आचरण करता है।
अपने को ज्ञानी मान लेने के बाद भी मनुष्य से भूल हो सकती है। नारद जैसे मुनि भी मोहग्रस्त हुए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनका ज्ञान मिथ्या था, बल्कि यह कि ज्ञान का होना और प्रत्येक क्षण उसी ज्ञान के अनुरूप व्यवहार कर पाना—दो अलग बातें हैं। विवेक होते हुए भी कभी-कभी मनुष्य उस विवेक को पीछे छोड़ देता है और मोह, कामना, अहंकार अथवा किसी अन्य मानसिक आवेग के प्रभाव में आ जाता है।
इसीलिए केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि क्या उचित है और क्या अनुचित। आवश्यकता इस बात की भी है कि उचित-अनुचित का निर्णय करते समय हमारा विवेक जाग्रत रहे। विवेक कब साथ छोड़ दे, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
सामान्य मनुष्य से लेकर ज्ञानी महात्मा तक के मनोभावों में भी दिनभर परिवर्तन होते रहते हैं। प्रातःकाल मन अपेक्षाकृत शांत और निर्मल रहता है। दिन चढ़ने के साथ संसार के कार्य-व्यापार, दायित्व और अनेक प्रकार की इच्छाएँ मन को अपनी ओर खींचने लगती हैं। परिस्थितियों के अनुसार मन में सत्त्व, रजस् और तमस्—इन गुणों का प्रभाव कम-अधिक होता रहता है। इसलिए केवल अपने किसी एक समय के मनोभाव को देखकर स्वयं को स्थायी रूप से विवेकी अथवा अविवेकी मान लेना उचित नहीं।
शायद इसी कारण हमें प्रातःकाल की शान्ति प्रिय लगती है। उस समय मन पर संसार का अपेक्षाकृत कम आक्रमण होता है। जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे बाहरी संसार की गतिविधियाँ मन को अधिकाधिक प्रभावित करने लगती हैं और हम अनेक प्रकार के निर्णय लेते हैं। इनमें से कुछ निर्णय विवेकपूर्ण होते हैं, तो कुछ पर बाद में स्वयं हमें आश्चर्य होता है कि हमने ऐसा क्यों किया।
आत्मानुशासन का अर्थ शायद यही है कि मनुष्य इस परिवर्तनशीलता के प्रति सदैव सजग रहे। जो व्यक्ति आत्मानुशासन को महत्त्व देता है, वह अपनी चेष्टाओं के प्रति सावधान रहता है। वह यह मानकर नहीं चलता कि अब वह इतना विवेकी हो गया है कि उससे कभी कोई भूल हो ही नहीं सकती। बल्कि वह इस सम्भावना को सदैव स्वीकार करता है कि किसी क्षण उसका मन उसे ऐसी दिशा में ले जा सकता है, जो उसके लिए उचित न हो।
इसलिए आत्मानुशासन में केवल अपने ऊपर विश्वास ही नहीं, अपने ऊपर सतत निगरानी भी आवश्यक है। प्रयास करते रहना हमारे हाथ में है; पर अपने विवेक के प्रति पूर्णतः निश्चिन्त हो जाना शायद उचित नहीं। मनुष्य को अपने ज्ञान पर अहंकार नहीं, बल्कि अपने विवेक की रक्षा के लिए विनम्र सजगता रखनी चाहिए।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
सामान्य प्राणियों के लिए जो रात्रि है, उसमें संयमी जागता है; और जिसमें सामान्य प्राणी जागते हैं, वह मुनि के लिए रात्रि के समान है। इसका आशय केवल दिन और रात के बाहरी विभाजन से नहीं, बल्कि दृष्टि और चेतना के अन्तर से है।
मनुष्य के लिए वास्तविक साधना शायद यही है कि वह अपने भीतर उठने वाले भावों और विचारों को पहचानता रहे। वह अपने ज्ञान पर भरोसा करे, पर ज्ञान का अहंकार न करे; विवेक का उपयोग करे, पर यह न माने कि उसका विवेक कभी विचलित हो ही नहीं सकता; आत्मानुशासन का अभ्यास करे, पर अपनी सफलता के प्रति पूर्णतः आश्वस्त न हो जाए।
क्योंकि मनुष्य का मन परिवर्तनशील है।
विवेक को जाग्रत रखना पड़ता है।
और शायद इसी सतत जागरूकता का नाम ही साधना है।
~राजीव रंजन प्रभाकर 

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