युद्ध
युद्ध
युद्ध सदैव दो पक्षों के बीच होता है। इसके मूल में धन, सम्पत्ति एवं स्त्री पर स्वामित्व स्थापित करने अथवा किसी अन्य प्रकार का प्रभुत्व जिसमें वैचारिक एवं धार्मिक वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा से उत्पन्न संघर्ष भी हो सकता है। यही संघर्ष जब हिंसक रूप धारण कर लेता है, तब युद्ध का रूप ले लेता है। वैसे युद्ध प्रायः दो परस्पर संघर्षरत पक्षों के बीच शक्ति-संघर्ष को ही कहा जाता है।
युद्ध में एक पक्ष जो स्वयं को सबल समझता है, वही प्रायः आक्रमण करता है; किन्तु निर्बल या अपेक्षाकृत कम सबल पक्ष भी स्वयं को आहत समझने की स्थिति में प्रतिकार करता है। कभी-कभी विवश होकर किया गया प्रतिकार भी युद्ध का रूप ले लेता है। अतः वास्तविक शक्ति-सम्पन्न पक्ष अपना प्रभुत्व स्थापित करने की मंशा से हो या कोई पक्ष अपने अस्तित्व अथवा अधिकार की रक्षा के लिए—युद्ध में अन्ततः दोनों पक्षों की शक्ति की परीक्षा होती है।
यद्यपि युद्ध में किसकी जय होगी और किसकी पराजय—इसका अनुमान ठीक-ठीक पहले से नहीं लगाया जा सकता। इस स्थिति में भी यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि कौन पक्ष सबल है और कौन कम बलवान; क्योंकि युद्ध की परिणति भी यथापरिस्थिति के रूप में प्रारब्ध के अधीन होती है।
किन्तु यदि किसी पक्ष को पहले से ही यह ज्ञात हो कि उसकी शक्ति अपेक्षाकृत कम है, तब भी यदि वह यह समझता है कि युद्ध से पीछे हटना उसके लिए उचित नहीं होगा और वह अपने कर्तव्य के निर्वहन के रूप में युद्ध में सम्मिलित होता है, तो क्या उसे युद्ध से विमुख हो जाना चाहिए? विशेषकर तब, जब उसे यह ज्ञात हो कि वह युद्ध में प्रतिपक्ष के रूप में पूरी शक्ति से संघर्ष करने वाले अधिक शक्तिशाली पक्ष के सामने टिक नहीं पाएगा?
मेरे विचार से नहीं। यदि युद्ध उसके लिए कर्तव्य बन चुका है, तो केवल अपनी सम्भावित पराजय के भय से उससे पीछे हटना उचित नहीं है। परिणाम उसके हाथ में नहीं है; उसके हाथ में केवल अपना कर्तव्य है।
वृत्रासुर को यह ज्ञात था कि इन्द्र के पास दधीचि ऋषि की अस्थियों से निर्मित वज्र है, जिसे स्वयं भगवान की आज्ञा से विश्वकर्मा ने बनाया था। उसे यह भी ज्ञात था कि उस दिव्य अस्त्र के सामने उसके लिए विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। फिर भी वह निर्भीकतापूर्वक इन्द्र से युद्ध करता रहा और अन्ततः पराजित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।
यह पुराण में वर्णित प्रसंग है। इस प्रकार युद्ध में केवल जीतने वाले की ही परीक्षा नहीं होती, बल्कि हारने वाले की भी परिस्थिति तथा उसकी मनःस्थिति की परीक्षा होती है। कभी-कभी हार सामने दिखाई दे रही हो, फिर भी अपने कर्तव्य से पीछे न हटना ही मनुष्य के लिए उसके धर्म का पालन हो सकता है। ऐसे अवसर पर युद्ध का मूल्य उसकी विजय में नहीं, बल्कि कर्तव्य के निर्वहन में निहित होता है।
युद्ध कभी-कभी एक पक्षीय भी होता है। ऐसे में दूसरा पक्ष हारा हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन उसका संघर्ष निरर्थक नहीं हो जाता। यदि उसे यह विश्वास है कि उसके सामने उपस्थित परिस्थिति से संघर्ष करना ही उसका कर्तव्य है, तो परिणाम चाहे जो हो, उसका युद्ध करना अपने आप में सार्थक हो सकता है।
आखिर युद्ध केवल जीतने के लिए ही नहीं लड़ा जाता। कभी-कभी युद्ध इसलिए भी लड़ना पड़ता है कि अन्याय के सामने आत्मसमर्पण न किया जाए, अपने अधिकार अथवा स्वाभिमान की रक्षा की जाए और अपने कर्तव्य से विमुख न हुआ जाए। ऐसी स्थिति में पराजय भी उस संघर्ष को निरर्थक नहीं बनाती।
युद्ध का परिणाम जय या पराजय हो सकता है; लेकिन युद्ध में उतरने का कारण और उसके पीछे निहित कर्तव्यबोध उससे अलग प्रश्न है। इसलिए किसी युद्ध को केवल उसके परिणाम के आधार पर उचित या अनुचित ठहरा देना हमेशा उचित नहीं होगा।
मेरे विचार से युद्ध की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा; बल्कि यह भी है कि किसने किस उद्देश्य से युद्ध किया और क्या वह अपने कर्तव्य से विमुख हुआ या नहीं।
यही कारण है कि कभी-कभी पराजित होकर भी कोई व्यक्ति या पक्ष नैतिक रूप से विजयी हो सकता है, और विजयी होकर भी कोई पक्ष अपने आचरण के कारण नैतिक रूप से पराजित हो सकता है।
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ऊपर वर्णित युद्ध के अतिरिक्त अन्य प्रकार का भी युद्ध है जिसे छद्म युद्ध कहा जाता है। इसमें दोनों पक्ष एक दूसरे के सामने आने की बजाय एक दूसरे पर छिप के प्रहार करता है। ऐसे युद्ध बिना किसी घोषणा तथा बिना किसी स्थापित नियम के लड़े जाते हैं. Non State Actors किसी राष्ट्र या सरकार के विरुद्ध इसी छद्म युद्ध के सहारे जीवित हैं।
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इसके अतिरिक्त एक अन्य प्रकार का युद्ध जो दूसरों के लिए प्रायः अगोचर एवं सर्वथा अदृश्य प्रकृति का है, वह युद्ध हमारे भीतर चलता रहता है. इसे अंत:करण का युद्ध कहेंगे.
बॉंकि युद्ध तो समय-समय पर एक अवधि विशेष तक हीं लड़े जाते हैं किन्तु अंत:करणों का युद्ध व्यक्ति के अंत:करण में जीवनपर्यंत चलता रहता है.
इसका समापन तब हीं होता है जब मनुष्य निष्प्राण हो जाता है.
~राजीव रंजन प्रभाकर
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