ऊपर से रामायण मगर भीतर से पक्का महाभारत हूॅं
फाइलों को ऊपर-ऊपर से पढ़ता हूॅं लेकिन भीतर-भीतर हीं तौलता हूॅं, मगर लगता है जैसे नींद में सोया हूॅं-खोया हूॅं. *** घर में अज़ीज़ों से घिरा हूॅं, मगर तबियत ऐसी जैसे कोई मिटिंग में हूॅं. बिछावन पर लेटा हूॅं, मगर लगता है आफिस में बैठा हूॅं. *** हूॅं मुखातिब तेरी ओर, मगर पाॅंव गामजन हैं उसकी ओर. रिंद की सीरत में ख़िज़्र दिखता हूॅं, हूॅं इधर का मगर उधर का लगता हूॅं. *** पूजा-इबादत में ऑंखें मूंद कर माला-तस्बीह फेरता हूॅं, मगर बगल से कौन गुजरा उसका भी हिसाब रखता हूॅं. ******* लुब्ब-ए-लुबाब कि जहॉं हूॅं वहीं से नदारद हूॅं; जिंदा वक़्त के क़त्ल ओ ग़ारत में पारंगत हूॅं. या कहिए ऊपर से रामायण मगर भीतर से पक्का महाभारत हूॅं. ~राजीव रंजन प्...