भारतीय संस्कृति की एक झलक
भारतीय संस्कृति की एक झलक
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महाराणा प्रताप तेज बुखार से तप रहे थे. सारा शरीर भट्ठी की तरह जल रहा था. बगल में बैठी महारानी किंचित चिंतित उनकी देखभाल कर रहीं थीं.
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तभी शिविर के बाहर कर्त्तव्यस्थ प्रहरी की आवाज़ आती है.
महाराणा की जय हो!वीरवर उज्ज्वल सिंह महाराणा से मिलने की अनुमति चाहते हैं.
महाराणी (महाराणा का इशारा पाकर) प्रहरी को ---उन्हें प्रवेश करने दिया जाए.
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कुछ हीं देर में उज्ज्वल सिंह महाराणा के सामने उपस्थित होकर उनका विनम्रतापूर्वक अभिवादन कर एक ओर खड़े हो जाते हैं.
महाराणा-कहो उज्ज्वल सिंह! क्या ख़बर लाए हो.
उज्ज्वल सिंह- महाराणा की जय हो! समाचार बहुत ही शुभ एवं हर्षवर्धक है. बादशाह अकबर स्वयं किसी आकस्मिक कारण से दिल्ली कूच कर गए और इस प्रकार बादशाह की अनुपस्थिति में सेनापति अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में लड़ रही मुगलों की सेना को आपके वीर सुयोग्य पुत्र युवराज जू (अमरसिंह) ने बुरी तरह परास्त कर धूल चटा दिया है.
बुरी तरह हार कर खानखाना भाग खड़े हुए हैं और इसी मौके का फ़ायदा उठाकर युवराज ने मुगलों के हरम को भी चारों ओर से घेर रखा है.
महाराणा यही मौक़ा' है कि मुगलों से सारी दुश्मनी निकाल ली जाए.
(उज्ज्वल सिंह एक हीं साॅंस में ख़ुशी से ये सारी बातें कह गए)
ये सुनते हीं महाराणा क्रोध से भर उठे तथा बगल में बैठी महारानी को यह कहते हुए अचानक उठ खड़े हुए -तुम्हारा बेटा अमर सिंह ऐसी हरकत करेगा इसका मुझे रत्ती भर गुमान नहीं था.
इससे पहले कोई कुछ समझता वे बोले-उज्जवल सिंह! तुरंत चेतक को तैयार करो.
अगले हीं कुछ क्षण में महाराणा उस हरम के बाहर खड़े थे तथा उन्होंने अकबर की सेना को परास्त करने की खुशी में अपने पुत्र युवराज को गले लगा कर उसकी वीरता की भूरी-भूरी प्रशंसा की.
किंतु यह क्या! दूसरे हीं क्षण उन्होंने अमर सिंह को दूर धकलते हुए कड़ी फटकार लगाते हुए कहा-अमर सिंह! मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी. तुमने वीरोचित धर्म का उल्लंघन किया है.
शत्रु पक्ष की माताओं और बहनों का भी आदर, सम्मान और सुरक्षा करना वीरों का धर्म है तथा यही राणावत की शान भी है.
तुमने शिविर में बादशाह के शाही हरम को घेरकर वहाॅं रह रहीं स्त्रियों का अपमान तो किया हीं है बल्कि तमाम क्षत्रियगण के रहते उन्हें असुरक्षित महसूस करा दिया.
धिक्कार है ऐसी वीरता पर!
इसका दण्ड तो मैं तुम्हें बाद में दूंगा किंतु इस समय अवसर दूसरा है.
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अगले हीं पल महाराणा हरम के मुख्य द्वार पर जा खड़े हुए और हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक किंतु ऊॅंची आवाज में बोले- बादशाह अकबर के शाही हरम की सभी बेग़मों, शहजादियों को मेवाड़ के सपूतों की तरफ़ से और इस महाराणा की ओर से आदाब क़ुबूल करने की गुजारिश है!
फिर बादशाह अकबर की बड़ी बेग़म को लक्ष्य कर बोले- बड़ी साहिबा जू! मेरे बेटे अमरसिंह की तरफ से जो गुस्ताखी की गई है उसके लिए मैं तहे दिल से मा'ज़रतख़्वाह हूॅं. आप सभी पूरी तरह मेवाड़ के सपूतों के बीच सुरक्षित हैं तथा आप सभी को महाराणा की सेना की सुरक्षा में दिल्ली जाने का बंदोबस्त तुरंत किया जा रहा है. आप हरम के तहफ़्फ़ुज के बाबत थोड़ी सी भी ख़द्शात को दिल से निकाल दीजिए और महाराणा की सेना को अपनी ख़िदमत का मौका फ़राहम कर इस नाचीज़ पर इनायत फ़रमाएं.
इस समय आप सभी माताएं और बहनें हमारी अतिथि हैं.
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हरम(जनानखाने)के भीतर से एक महीन आवाज़ आई--- महाराणा! आपकी बातों को सुनकर मुझे बेइंतहा तस्कीन हासिल हुआ है. आपने हमारी सारी परेशानी को एक पल में दूर कर दिया. आप वास्तव में सच्चे महाराणा हैं; इसीलिए तो पूरी दुनिया आपको सर्वश्रेष्ठ योद्धा कहती है. मुग़ल सल्तनत की ये शाही बेग़म सहित सारी बेगमें और शहजादियां आपको आदाब करती हैं, मेरा आदाब क़ुबूल करें.
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अगले हीं दिन हरम की सारी महिलाएं शाही महल तक महाराणा की सेना की सुरक्षा से सुरक्षित दिल्ली पहुॅंच गई.
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बादशाह अकबर को जब इस बात का पता चला तो उसके मुॅंह से अकस्मात् निकल पड़ा-वाह रे फ़रिश्ते!
प्रस्तुति-
राजीव रंजन प्रभाकर
१७.०६.२०२६
(महाराणा प्रताप जयंती)
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