गङ्गास्मरण
गङ्गास्मरण
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स्मरेन्निलिम्पनिर्झर्याः कलकलनिनादम्।
या प्रभूता शिवस्य जटाकपर्दात्॥
भजेन्नित्यं विष्णुपदीं नूपुरध्वनिमधुराम्।
या प्रददाति विष्णुपदसान्निध्यम्॥
पिबेद् विष्णुचरणधोवनजलम्।
यदुच्यते धरायां गङ्गाजलम्॥
निमज्जेद् धर्मसेवी गङ्गाजले।
या ददौ जानक्यै आशीर्वचनम्॥
जपेन्नित्यं गङ्गातटे रामनामामृतम्।
यत् कलौ धर्मार्थकाममोक्षसाधनम्॥
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मा कुरु संशयम् मां कुरु संशयम्।
इदमेव औषधि संसारतापनाशनम्।।
(स्वरचित)
~ राजीव रंजन प्रभाकर
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हे भक्तगण!
आपलोग देवनदी की निर्झर करती कलकल निनाद का स्मरण करें जो आशुतोष शिव के जटाजूट से निकलती है.
भगवान विष्णु के सान्निध्य की प्रदायिनी नुपुर ध्वनिरूप विष्णुपदी को भजें.
भगवान विष्णु के चरण धोवन जल जिसे इस धरती पर गंगाजल कहा गया है,को पियें.
जिस देवनदी ने जगज्जननी जानकीजी तक को आशीर्वाद दिया उसी नदी के जल में डुबकी लगाएं.
गंगा तट पर आसन लगा कर रामनाम अमृत का जप के रूप में पान किया करें जो इस कलियुग में धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष सभी को रागपूर्वक दे देनेवाला है.
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संशय न करें, संशय न करें.
संसारतापनाश की यही औषधि है.
भावानुवाद-
राजीव रंजन प्रभाकर
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