डीए बला एरियर

डीए बला एरियर 
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आय आफिस से सबेरगर लौट एलौं, सब दिन तै लेटे भऽ जाय ये. सब दिन आफिस टाइम के बाद फेर बड़का-बड़का हाकिम के भीसी-भीसी-भीसी; बूझू जे सम्पूर्ण व्यवस्था'क संचालक इ भीसीए महाराज भऽ गेल छथिन.
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हम-माय! घर में तू असगरे छी! कनिया(हमर पत्नी) कतय गेलौ? हुनका नै देखै छिए?
माय-ओ कनि काल भेलय बजार दिस गेल छथिन. कहलखिन हमरा जे माॅं जी एक घंटा में आ रही हूॅं 'माउल' से; वैह बड़का दोकान जतय एक बेर तूॅं हमरा देखाबऽ लेल ल गेल छलैं.
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माय(हमरा चाय दैत)-आय रौ बौआ! इ 'डीए बला एरियर' कथी होयत छै?
हम(चौंक के)-माय! तोरा इ सब बुझै के कोन जरूरी प‌इर गेलौ? तूॅं कि करबिही इ सब जाइन के?
माय-धौ; हमरा जानय के कोन जरूरी रहत! तोरे देखै छियौ जे जब ने तब बहुरिया पूछैत रहै छौ जे 'डीए वाला एरियर' अभी तक हमको क्यों नहीं दिये हैं? इ जे कथू होयत होय हम नै बुझै छिए बरु तूॅं दै किएक नै दय छी हुनका?अनेरो माथ भुकबैत रहय छौ.
हम- मने दरमाहा वला सब टा रूपैया तऽ ओ हमरा से झाइरे लय ये;आ जे किछु बाहर में चाह-पान-पत्ती खाय लेल इ जे किछु भेटल ये डीए एरियर'क रूप में तहू पर तोहर पुतोह नजैर गड़ैने रहय छौ.
 हम इ हुनका कोनो हालतै नै देबय.
माय-दय दही, कथी लऽ रगड़ करबै. 
   चाह-पान सब लेल तो हमरे से लऽ लेल करिहें.
हम- मने तूहूॅं ओकरो दिस से बाजय छी. सैह नय!
                ~राजीव रंजन प्रभाकर
                     ०५.०६.२०२६

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