"कुछ मत करो"-का वास्तविक आशय
एक महात्मा का कथन है—"कुछ मत करो।" पहली दृष्टि में यह कथन असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि जीवित रहते हुए कोई भी व्यक्ति पूर्णतः अकर्म नहीं रह सकता। जीवन स्वयं एक सतत क्रिया है। तब इस वचन का वास्तविक आशय क्या है?
इसका तात्पर्य यह है कि जो भी कर्म सामने कर्तव्य के रूप में उपस्थित हो, उसे अपनी समस्त क्षमता, लगन और निष्ठा के साथ संपन्न करो; किन्तु उसके परिणाम के प्रति आसक्त मत हो। कर्म पूर्ण होने के पश्चात् उसे छोड़ दो। उसके फल, सफलता-असफलता अथवा अनुकूल-प्रतिकूल परिणामों के रस में डूबे रहने का प्रयास मत करो। यदि परिणाम के प्रति मन उदासीन हो जाए, तो अनुकूल और प्रतिकूल दोनों स्थितियाँ समान प्रतीत होने लगती हैं।
यदि कर्म करते हुए भी मन में यह भाव स्थिर बना रहे कि "मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ," तो यह अत्यन्त उच्च आध्यात्मिक अवस्था है। इस भाव को क्रमशः पुष्ट और प्रगाढ़ करते जाना चाहिए।
गीता कर्म के इसी रहस्य का उद्घाटन करती है—
"नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।"
तत्त्वज्ञ योगी यह जानता है कि वास्तव में वह कुछ नहीं करता। देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना, खाना, चलना, सोना, श्वास लेना, बोलना, त्यागना, ग्रहण करना, आँखें खोलना और बंद करना—ये सब इन्द्रियों के स्वाभाविक व्यापार हैं। इन सबके बीच भी वह स्वयं को अकर्ता ही जानता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्लोक में "सोचता हुआ" नहीं कहा गया है। कारण यह है कि सोचना हीं मानना है और यह मन की की एक क्रिया है। यदि आप मानना शुरू कर देंगे कि मैं सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं कर रहा हूॅं तो कर्ता भाव धीरे-धीरे साक्षी भाव में बदलता जाता है।
~राजीव रंजन प्रभाकर
०१.०८.२०२६
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