का चुप साधि रह‌उ बलवाना

का चुप साधि रह‌उ बलवाना
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वानर राज सुग्रीव द्वारा माता सीता का पता लगाने हेतु युवराज अंगद के नेतृत्व में भेजी गई वानरी सेना सिन्धु के तट पर उदास बैठी हुई है.
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गीद्ध जटायु के अग्रज सम्पाती ने इतना तो बता दिया कि माता सीता समुद्र के उस पार स्थित लंका द्वीप में है किन्तु सौ योजन तक विस्तृत समुद्र के उस पार पहुॅंचा कैसे जाय, इसी चिंता में मग्न समस्त वानरवीर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठे हैं.
सम्पाती ने तो यहाॅं तक कह दिया कि जो आपमें से सौ योजन का सागर लांघ सकता है वही शरीर से बलशाली और साथ-ही-साथ बुद्धि से सम्पन्न वीर हीं माॅं सीता का लंका में पता लगा सकता है.
सौ योजन सागर को नांघना कोई हॅंसी-खेल की बात तो थी नहीं!
  जो नाघ‌इ सत जोजन सागर।
  कर‌इ सो राम काज मति आगर।।
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अंततः रीछपति जामवंत जी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा-वानर वीरों! ऐसे चुप्पी साध उदास बैठे रहने से क्या प्रभु श्रीराम का काम हो जाएगा? बड़ी अजीब बात है!
तुमलोग अपना-अपना बल तो बताओ जो पता चले कि सौ योजन समुद्र को नांघने की क्षमता तुम में से किसी को है भी या नहीं?
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द्विविद ने असमर्थता जताते हुए दुःख के साथ कहा-मुझे तो एक बार में दस योजन तक हीं छलांग लगाने की क्षमता है और ये समुद्र तो सौ योजन का है.
मयंद बोले-मैं २५ योजन तक एक हीं साॅंस में कूद सकता हूॅं. इससे आगे की ताकत नहीं है.
गद ने कहा- मैं एक बार में पूरी ताकत लगा कर ५० योजन का छलांग मार लूंगा. किंतु समुद्र तो सौ योजन का है। 
अतः सौ योजन वाले इस समुद्र में छलांग लगाने से मेरा भी डूबना तय है.
नल-नील ने कहा- मैं तो सिर्फ शिल्प कार्य हीं करता रहा, बहुत दूर तक उछलने-कूदने का अभ्यास भी धीरे-धीरे छूट सा गया.
अंत में युवराज अंगद बोले- मैं १०० योजन का छलांग तो लगा लूंगा किंतु लौट कर आने में संदेह मालूम देता है क्योंकि मेरे में १०० योजन छलांग लगाने के बाद इतनी शक्ति भरसक नहीं बच पायेगी जो मैं वापस आ पाऊॅं.
वृद्ध-अनुभवी जामवंत जी बोले-नहीं-नहीं तुम्हें कैसे भेज दिया जाए? 
तुम तो इस दल के नायक हीं ठहरे. नायक को हीं पहले भेज देना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं है.
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इधर इन समस्त वार्तालाप को मूकदर्शक की भाॅंति मूढ़-निर्विकार भाव से चुप्पी साधे पवनपुत्र हनुमानजी को एक ओर दोगे में बैठे देख रीछराज जामवंत जी को रहा नहीं गया.
उन्होंने हनुमान को ललकारते हुए कहा -क्या हनुमान! तुम भी इस तरह चुप्पी साधे बैठे हो? तुम पवन के पुत्र होकर भी ऐसे बैठे हो मानो तुम्हें कोई शक्ति हीं न हो!
अरे पृथ्वी पर ऐसा कौन सा कठिन कार्य है जिसे करना तुम्हारे बस की बात नहीं है? जरा मुझे बताओ. 
और तुम तो प्रभु श्रीराम के कार्य के लिए हीं इस भूमि पर अवतरित हुए हो.
 तुम्हारा ऐसे चुप बैठे रहना हमलोगों को विस्मय में डाले जा रहा है. 
भला ऐसे भी कोई दुर्धर्ष वीर इस तरह के चुनौतीपूर्ण काम को देख कर भी बैठा रह सकता है? 
मुझे तो बड़ी हैरानी हो रही है.
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जामवंत के इस ललकार को सुनकर हनुमानजी को एकाएक अपनी अतुलित बल एवं वीरता का स्मरण हो आया.

        इतना सुनना था कि हनुमानजी का शरीर देखते-देखते पर्वताकार हो गया. मानो साक्षात् सोने का सुमेरू पर्वत हीं समुद्र के तट पर खड़ा हो गया हो.
हनुमान सिंहनाद की गर्जना करते हुए अपनी भुजाओं और जंघाओं को ऐसे घुमाने लगे मानो उस खारे समुद्र को हीं लील जाएंगे.
भीषण गर्जना के साथ हनुमान ने जामवंत जी को झकझोरते हुए कड़क कर पूछा- ऐ जामवंत! बताओ मुझे क्या करना है? क्या मैं माता सीता को अपनी पीठ पर बैठा कर यहाॅं ले आऊॅं?; क्या राक्षसेन्द्र रावण का सेना सहित वध कर पूरी लंका को जड़ समेत उखाड़ कर तुम्हारे चरणों में लाकर पटक दूॅं? 
कहो क्या कहते हो?
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जामवंत जी अपार हर्ष से आह्लादित होकर हनुमान की पूॅंछ सहलाते हुए बोले- नहीं वीर,नहीं. 
यद्यपि ऐसा करना तुम्हारे लिए कोई बड़ी बात नहीं है किन्तु अभी तुम्हें बस इतना करना है कि लंका जाकर वहाॅं माता सीता का सिर्फ पता लगा कर आ जाओ बांकि का काम प्रभु स्वयं वहाॅं जाकर करेंगे जिसका लोक-लोकान्तर में तथा जब तक यह पृथ्वी और आकाश है,समस्त जीवधारी जन्म-जन्मांतर तक प्रभु श्रीराम का सुयश गा-गाकर और सुन-सुनकर कृतार्थ एवं धन्य होते रहेंगे.
            ~राजीव रंजन प्रभाकर.

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