Posts

प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है.

प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है. ************************************** प्रेम और व्याकुलता में प्रभु के स्मरण की तो बात हीं क्या है अपितु भय-भ्रम से, लोभ-लालच से, रोष-आक्रोश से, राग-द्वेष से, हास-परिहास से भी उनका स्मरण सदैव हित प्रद, लाभप्रद, सुखप्रद तथा शांतिप्रद होता है.  प्रभु स्मरण बुद्धि को शुद्धता प्रदान करता है.                     *** प्रभु स्मरण के संदर्भ में संस्कृत का निम्न श्लोक द्रष्टव्य है- शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् । लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत ॥       व्यक्ति को सौ कार्य छोड़कर पहले भोजन करना चाहिए तथा एक हजार कार्यों को छोड़कर स्नान कर लेना चाहिए तथा लाखों व्यस्तताओं को त्यागकर दान करने का सत्कार्य करना चाहिए तथा प्रभु का स्मरण तो करोड़ों काम छोड़कर करना चाहिए. आश्चर्य है कि यह जान कर भी ऐसा कर पाना प्रायः कठिन होता है. प्रायः कार्य के दबाव में घर से बिना स्नान एवं भोजन किए बाहर निकल जाना, सुपात्र व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित होने पर सामर्थ्य के बावजूद...

श्रीराम के चरणारविन्द को तकिया समझ कर सोइए

श्रीराम के चरणारविन्द को तकिया समझ कर सोइए  समस्त चिंता फिकिर को सपने में धूल चाटते देखिए  उनके दया के मौध का ठोपे ठोप अनुपान करते रहिए समस्त आधि-व्याधि रोगादि के ठोंठ को मोके रखिए उन्हीं के कृपा प्रसाद का भोजन पकवान पाते रहिए जीवन रूपी तन-मन को हृष्ट एवं पुष्ट बनाए रखिए उन्हीं के कृपा कटाक्ष का कोट हमेशा पहने रहिए जग के समस्त ऐशन-फैशन को दाॅंत चियारे देखिए  उन्हीं के दरबार का जीवन भर मामूली चाकरी करते रहिए  अनुमान से बहुत बेसी वेतन-भत्ता उनके हाथ से पाते रहिए                            ~राजीव रंजन प्रभाकर.                                   ०३.१०.२०२५.

डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना

डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना  ************************************* क्या आपने नदी अथवा तालाब में डूबते हुए को किसी व्यक्ति द्वारा डूबते का हाथ पकड़कर बचाते हुए देखा है?  नहीं न! कारण स्पष्ट है. हाथ पकड़कर डूबते हुए को बचाने का प्रयास करने वाले की स्वयं भी डूब जाने की पूरी गारंटी है.  क्योंकि डूबने वाला उसे जोर से पकड़ लेता है और परिणाम है कि वह बचाने वाले को भी अपनी ओर खींच लेता है.  इस प्रकार वह स्वयं तो डूबता हीं है बचाने वाले को भी डूबो देता है.  यही कारण है कि जो किसी डूबते हुए को बचाने का प्रयत्न करता है वह दूर से कोई वस्त्र अथवा डोरी डूबने वाले की तरफ फेंक कर उसे पकड़ने का इशारा करता है ताकि दूसरे छोर को खींच कर उसे बचाया जा सके. ********************************************** एक सर्वसमर्थ प्रभु श्रीराम हीं ऐसे हैं जो भवसागर में डूबते हुए अपने सेवक जो उन पर हीं पूरी तरह से आश्रित रहता है, उसे उसका हाथ पकड़कर कर बाहर खींच लेते हैं.  साधारण नदी, तड़ागों की बात कौन कहे वे चाहें तो भवसागर में डूबते उतराते अपने भक्तों को हाथ पकड़कर कर भवसागर से उबारकर उसे ...

हिंदी और अंग्रेजी की प्रियता का पैमाना-मेरे लिए

---हिंदी--- हिंदी मुझे प्रिय है उतना  जितना           भालू को शहद          खरगोश को गाजर           बंदर को केला          घोड़े को चना          हाथी को केतारी          बच्चे को मिठाई  अंग्रेजी मुझे उतना ही प्रिय है   जितना           स्टुडेंट को एक्जामिनेशन           एसपिरेंट्स को कम्पिटीशन           लीडर को इलेक्शन           पेशेंट को आपरेशन           विज्डम को टेम्प्टेशन          प्रोफेशनल्स को रेपुटेशन  ****       हिंदी दिवस की अनंत शुभकामनाएं             हिंदी भारत का भविष्य बने                              ...

जब और तो

जब मंज़िल का पता न हो  तो  जिस राह पर चलते जा रहे हैं  वही आख़िरत में मंज़िल बन जाती है. ** जब 'अपना' कोई न सुने दर्द  तो  जो सुनने को तैयार हो वहीं अपना कहलाती/ता है ** जब जाने वाला गिला भूल कर लौट आए  तो  उसे ठुकराना भी फिर ग़ैर वाजिब है. ** किस के दिल में क्या बसता है यही बात  तो  पहले ख़ुद के दिल से पूछना भी मुनासिब है. **       ~राजीव रंजन प्रभाकर. جب منزل کا پتہ نہ ہو  تو  جس راہ پر چلتے جا رہے  وہی آخرت میں منزل بن جاتا ہے۔ ** جب اپنا کوئی سنے ن درد  تو  جو سننے کو تیار ہو وہی اپنا کہلاتی/تا ہے  ** جب جانے والا گلا بھول کر لوٹ آئے  تو اسے ٹھکرانا بھی پھر غیر واجب ہے۔ ** اس کے دل میں کیا بستا ہے یہی بات  تو   پہلے خود کے دل سے پوچھنا بھی مناسب ہے۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

सलाह.

सलाह. ***** एक जमाना था जब लोग अपने से बड़े बुजुर्गों से सलाह लेने आया करते थे. सलाह देने वाले को भी स्वयं के महत्वपूर्ण होने का अहसास होता था.  किंतु आज स्थिति दूसरी है.   आज के इंटरनेट वो कृत्रिम प्रज्ञा(Artificial Intelligence) के इस युग ने प्रायः हर किसी को समान रूप से बुद्धिमान बना दिया है.       सभी के पास प्रायः उतनी हीं सूचना रहती है जितना दूसरों के पास. साथ हीं निर्णय लेने के लिए जितनी सूचना का होना आवश्यक होता है वह हर किसी के पास कमोवेश बराबर परिमाण में हीं रहता है.           इसलिए आज का जमाना किसी को सलाह देने का नहीं रह गया है. ***************************************  वैसे तो बिना मांगे सलाह देना नहीं चाहिए; मेरे विचार से तो अब मांगने पर भी नहीं देना चाहिए. इधर-उधर की बात कर के टाल देना चाहिए.               जानते हैं क्यों?  सलाह मांगने वाला अपना निर्णय पहले हीं ले चुका होता है. आपसे सलाह मांग कर वह आपका सिर्फ व्यू प्वाइंट जानना चाहता है.        ...

Oh Sanskrit !

Oh Sanskrit! I didn't give you your due while I was a student.  I thought you to be merely a language of little relevance in view of my inclination to pursue science in college. You appeared to me as a load to get rid of by passing the exam anyway. Moreover,for long as a student and many years even after that,I remained under the impression that you are the language of rituals. More deplorably,I associated you,not without reason,with a particular section of society.  How mistaken I was to remain under such a falsely concluded impression!           As I grew up I began to feel your true worth in shaping an individual as a worthy member of the society. Slowly slowly as I started enhancing acquaintance with you I realised that - 1.You are not just a language but much more than that. While other languages are mere mediums of communication you are the creator and nourisher of all that is good in an individual. 2.While other languages compete unhealthily wit...

वैसी ही मेरी सीरत-वैसी ही मेरी सूरत

पढ़ कर मेरी नज़्में  मत लगाना मेरे तू सीरत का अंदाज़ा  जिस वक़्त जैसी  दिमाग़ी कैफियत वैसी हीं मेरी सीरत वैसी ही मेरी सूरत  वैसी हीं मेरी फितरत  वैसी हीं मेरी नज़्में  वैसे हीं मेरे रब्त़ वैसे हीं मेरे ज़ब्त.                       ~राजीव रंजन प्रभाकर                               ३१.०८.२०२५ پڑہ کر میری نظمیں  مت لگانا میرے تو  سیرت کا اندازہ۔ جس وقت جیسی  دماغی کیفیت  ویسی ہی میری سیرت  ویسی ہی میری صورت  ویسی ہی میری فطرت  ویسی ہی میری نظمیں  ویسے ہیں میرے ربط ویسے ہیں میرے ضبط۔  نظم و ربط ضبط ۔ ***************************       بصد شوق  ~راجیو رنجن پربھاکر

विभक्तिमाला

विभक्तिमाला ******************************* संस्कृत में विभक्ति और लकार का बहुत महत्व है. जहाॅं शब्दों के रूप विभक्ति के अनुसार धारण करते हैं क्रिया का रूप काल के अनुसार बदलता रहता है जिसे लकार कहते हैं. संस्कृत में मुख्य रूप से सात कारक विभक्तियाँ होती हैं, जो क्रिया के साथ संज्ञा के विभिन्न संबंधों को दर्शाती हैं:  प्रथमा: कर्ता कारक (चिह्न: ने).  द्वितीया: कर्म कारक (चिह्न: को).  तृतीया: करण कारक (साधन) (चिह्न: से, के द्वारा).  चतुर्थी: सम्प्रदान कारक (देने या लेने के लिए).  पंचमी: अपादान कारक (अलगाव या दूरी दर्शाने के लिए).  षष्ठी: संबंध कारक (संबंध बताने के लिए).  सप्तमी: अधिकरण कारक (स्थान या समय बताने के लिए).  इनके अतिरिक्त एक संबोधन भी होता है.  संक्षेप में, विभक्ति शब्दों को वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ती है, जिससे वाक्य में व्याकरणिक संबंध और अर्थ स्पष्ट होता है. ******************************* निम्न श्लोकों में शब्दों में क्रम से सातो विभक्तियों का प्रयोग देखना रोचक है.              प्रस्तुत...

आप कौन हैं ?

आप कौन हैं? मैं एक प्राणी हूॅं.  'अजीब बात है ये कोई जवाब हुआ! प्राणि तो सभी हैं. मेरा मतलब है कि हैं कौन? मैं एक मनुष्य हूॅं  देखिए आप बात को घुमाने की कोशिश मत कीजिए. मेरा आप से कौन हैं, से मेरा पूछने का तात्पर्य यह है कि आप का 'नाम' क्या है, 'कहाॅं' रहते हैं, 'क्या' करते हैं वग़ैरह वग़ैरह.  आप से पूछा जा रहा है तो आप भाव खा रहे हैं जी? मेरा नाम अ.ब.स है मैं धरती पर रहता हूॅं और जीने के लिए काम करता हूॅं. तो आकाश में कौन रहता है?  रहता है न? कितने हीं पक्षी हैं जिनका आशियाना यह मुक्ताकाश है. ऐसे प्राणी नभचर कहलाते हैं. ज्यादा बनिए नहीं आप अपना परिचय ठीक से दीजिए; समझ गये न? मेरा नाम अ.ब.स है, मैं क.ख.ग शहर में रहता हूॅं और सरकार का एक मुलाज़िम हूॅं. वो तो ठीक है लेकिन इस परिचय में भी कमी हीं रह गया है.  मतलब केंद्र सरकार में कि राज्य सरकार में?  राज्य सरकार में. मतलब इतने से हो गया परिचय? राज्य सरकार के किस सेवा सम्वर्ग से हैं, किस विभाग में आदि आदि.  आप या तो बहुत चालाक हैं या अत्यंत मंदबुद्धि.  मंदबुद्धि तो आप दिखते नहीं फिर आप चालाकी कर रहे ...

संस्कृत दिवसे किंचित मम भावोद्गार:

अद्य श्रावण मासस्य पूर्णिमा तिथि:। प्रायः सर्वे जना: इयम तिथिम् रक्षा बंधन पर्वरूपेण जानन्ति.  किंतु अस्येतर: इयम तिथि विद्वानस: संस्कृत दिवस रूपेण अपि प्रतिष्ठितवान.  तर्हि प्रत्येक सम्वत्सरे इयम तिथि: संस्कृत दिवसाय आरक्षित:। सम्पूर्ण विश्वे संस्कृत भाषा तुल्य: न कोऽपि भाषा प्राचीनतमा विद्यते.  सर्वे भारतवासिन: कृते अयम गर्वविषयक तथ्य: यत् अस्या भाषाया: उद्गमस्त्रोत वेदा: वर्तते अपि च अस्य उद्गम स्थल: भारतस्य पुण्य भूमि.  सनातन धर्मस्य सम्पूर्ण वाड्मय संस्कृत भाषायाम् रचितं विद्यते।  वेदा: उपनिषद्श्च स्मृतिश्च मंत्रश्च संस्कृत भाषायाम् रचित कारणे यदि कोऽपि इयम भाषायै: सनातन धर्मधारिणी भाषा वदति इदम् न किंचित अतिशयोक्ति। प्राचीन काले संस्कृत भाषैव लोक व्यवहारस्य भाषाऽपि आसीत।  गुप्त काले संस्कृत भाषा लोक व्यवहारस्य शासनव्यवहारस्यश्च भाषा अपि आसीत।    कालक्रमे अस्य प्रसार: लोकानाम् क्रमशः क्षीणताम् प्राप्त:। वैज्ञानिक दृष्टया अपि च इयम भाषाया: प्रामाणिकता उपादेयता च अद्य निर्विवाद रूपेण प्रतिष्ठित:। अधुना संगणक(computer) विषयै: कृत्रिम प्रज्ञा(Ar...

कश्मकश

कश्मकश  ***************************** बोलूॅं तो वबाल हो, चुप रहूॅं तो सवाल हो. या रब मेरे तूॅं ही बता अब, आख़िर कैसा मेरा आ'माल हो?      ~राजीव रंजन प्रभाकर  کشمکش  ***************************** بولوں تو وبلا ہو چپ رہوں تو سوال ہو یا رب میرے تو ہی بتا اب آخر کیسا میرا اعمال ہو؟ ~ بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

America's Diplomacy: Veering Towards a New Normal.

America's Diplomacy is trying to shift itself towards a new normal. Words that are used for gaining edge over the others are far from diplomatic.  Words indicative of hubris and intimidations are issued as political statements even during peace times. We have known altercation as an anathema to diplomacy.   However altercation in open is more frequent and is being given a favour to be recognised as a way of talk on the diplomatic table. We have already seen America doing this while talking to Ukraine. These days America is in great haste. It is now not only in the role of a self- assumed global leader but global arbitrator also with a patent ambition to be recognised as a harbinger of peace and hegemony together at the same time. Their power borne hubris has tattered even the minimum diplomatic courtesy.            Diplomatic nuances stand substituted by clear cut ludicrous intimidatory language that even the spokesperson of the foreign secre...

नज़रियात जानिब ज़िन्दगी के

नज़रिया-१ ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा कुछ भी नहीं  और जुर्म मेरा क्या है ये पता ही नहीं  इतने हिस्से में बॅंट गया हूॅं मैं मेरे हिस्से का कुछ पता ही नहीं                        ~ना'मालूम नज़रिया-२ ज़िन्दगी से बड़ी ने'मत है कुछ भी नहीं  किस नेकी की है ये फ़ज़ीलत पता ही नहीं  हलकान इतना इसके करने के बावजूद  मोहब्बत का नशा इससे ता'उम्र छूटता नहीं  ~राजीव रंजन प्रभाकर. نظریہ- ١ زندگی سے بڑی سزا کچھ بھی نہیں  اور جرم کیا ہے یہ پتہ ہی نہیں  اتنے حصے میں بنٹ گیا ہوں میں میرے حصّے کا کچھ پتہ ہی نہیں  ~نامعلوم  نظریہ -٢ زندگی سے بڑی نعمت ہے کچھ بھی نہیں  کس نیکی کی ہے یہ فضیلت پتہ ہی نہیں  ہلکان مجھے اتنا اسکے کرنے کے باوجود  اس سے محبت کا نشہ تاعمر چھوٹتا نہیں  بصد احترام  -راجیو رنجن پربھاکر

आज का मित्रहीन समाज

आज मैत्री दिवस है.प्रत्येक वर्ष अगस्त के प्रथम रविवार को यह मनाया जाता है. आज की सच्चाई यह है कि फेसबुक जैसे प्लेटफार्म पर मित्र सूची सैकड़ों हज़ारों की संख्या में रहते हुए भी हम सभी प्रायः मित्रहीन ही हैं. आज के मित्रहीन समाज में मैत्री का महत्व को वही समझ सकता है जो वास्तव में एक-दूसरे के सुख-दुख का साथी हो.  किंतु जहाॅं सहयोग पूरी तरह से प्रतिस्पर्धा द्वारा विस्थापित किया जा चुका हो वहाॅं मैत्री का निर्वाह हो तो कैसे?  आज मित्रता समान सतह पर अवस्थित दो व्यक्तियों के मध्य हास-परिहास,आलाप-वार्तालाप की विषयवस्तु भर रह गई है.  यह हास परिहासादि भी तभी तक जारी रहता है जब तक दोनों की परिस्थितियां एक जैसी रहती है. जैसे हीं परिस्थिति बदलती है मैत्री समाप्त.   संस्कृत में इससे संबंधित एक श्लोक है-  कार्यार्थी भजते परस्परम् यावत् कार्यं न सिद्ध्यते।     प्राप्ते तु परे पारं नौकाया: किं प्रयोजनम्‌।। कार्यार्थी एक-दूसरे को तभी तक भजते हैं जब तक कि उनका एक-दूसरे से कार्य सिद्ध नहीं हो जाता है.  यह ठीक उसी तरह है जैसे पार उतर जाने पर नौका को लोग मुड़ कर भी नह...

What looks -----is usually

1.What looks effortless is usually deeply rehearsed. 2.What looks strenuous is usually not that much as it poses itself to be. 3.What looks indispensable is usually disposable at the end. 4.What looks glittering is usually not the gold. 5.What looks useless is usually sought after it ceases to exist. 6.What looks naive is usually a ruse. 7.What looks like justice is usually the  choice of those who dispense it. 8.What looks like injustice is usually the preference of the society. 9.What looks effective is usually efficient also. 10 What looks in order is usually based on tradition.                                         ~R.R.Prabhakar.

महादेव स्तुति.

यस्य स्मरणमात्रेण दृश्यते जगत् हस्तामलकसम। नमाम्यहम् तम् महायोगी अजमनादिम् महेश्वरम्।। (जिसके स्मरण मात्र से सम्पूर्ण जगत हथेली पर रखे ऑंवले के बराबर दिखता है उस अनादि,अजन्मा एवं महायोगी महेश्वर को मैं प्रणाम करता हूॅं.)                     ***** यस्य वामांके विभाति अन्नपूर्णा मातापार्वती। नमाम्यहम् तम् आशुतोष: त्र्यंबक: महेश्वम्।। (जिनके वाम भाग में अन्नपूर्णा माता पार्वती शोभित हो रही हैं उन आशुतोष त्रिनेत्र सम्पन्न महेश्वर को मैं प्रणाम करता हूॅं.)                     ***** यस्य भाले शोभते मयंकश्च गंगा त्रिपथगामिनी। नमाम्यहम् तम् भुजंगभूषित सर्वलोकमहेश्वरम्।। (जिनके मस्तक पर चंद्रमा और त्रिपथगामिनी गंगा शोभायमान है उन भुजंगाभूषण से भूषित सर्वलोक महेश्वर को मैं प्रणाम करता हूॅं.)                      ***** यस्य रामभद्रास्ति एकमात्र स्वामी सखा सेवक: नमाम्यहम् तम् विश्वनाथं उमापति महेश्वरम्।। (जिनके श्रीराम स्वामी सखा और सेवक एक साथ त...

रावण का बेटा प्रहस्त

रावण के अनेक पुत्र थे. उनमें उसके दो पुत्र मेघनाद तथा अक्षय कुमार के बारे में प्रायः सभी लोग जानते हैं. मेघनाद उसका ज्येष्ठ पुत्र था जो अपने पिता के समान हीं अत्यंत मायावी एवं अतुलित बलशाली था. परम मायावी तथा अतुलित बलशाली होने के साथ-साथ मेघनाद अपने पिता का परम आज्ञाकारी भी था. रावण की जो भी आज्ञा होती उसे वह ऑंख मूंद कर पालन करता था. यही कारण था कि वह अपने पिता का परम प्रिय पुत्र था.  अक्षय कुमार भी अपने ज्येष्ठ भ्राता के समान हीं बलवान और पितृभक्त था.           जहाॅं युद्ध में मेघनाद का वध रामानुज लक्ष्मण के हाथों हुआ अक्षय कुमार हनुमान के हाथों युद्ध से पहले हीं मारा गया.  ******************************************************* उपरोक्त दोनों पुत्रों के अतिरिक्त रामचरितमानस में रावण के जिस एक अन्य पुत्र की चर्चा हुई है, उसका नाम प्रहस्त है.  प्रहस्त उचित वक्ता था. वह ठकुरसुहाती करना नहीं जानता था. यह अनुभव की बात है कि जो सत्य बोलता है वह किसी का प्रिय नहीं होता है. सत्ता को तो बिल्कुल नहीं.  सत्ता को स्तुति प्रिय है.सत्ता का यह सहज य...

कस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता?

कस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता?       वशे हि यस्य इन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता.                                      (२/६१)       इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्य: तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता.                                      (२/५८) (२/६८)       न अभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता.                                      (२/५७)                         From the Bhagavad Gita. 

Did You Know?

Knowing these words is not necessary at all.           However knowing them may be interesting to those who are driven by the passion to enrich their vocabulary. So here is the list- Did you know? 1. The cry of a new born baby is called 'vagitus'. 2. The space between your eyebrows is called 'glabella'. 3. The little toe or finger is called 'minimus'. 4. The sick feeling that you get after eating and drinking too much is called 'crapulence'. 5. The space between your nostrils is called 'columella nasi'. 6. The sheen of light that you see when you close your eyes and press your hands on them is called 'phosphenes'. 7. When your stomach rumbles, that's 'wamble'. 8. Finding it difficult to get out of bed in the morning is called 'dysania'. 9. The space just below the columella nasi is covered by the ridge called philtral ridge. 10. The plastic or metallic coating at the end of your shoe laces is called 'aglet'. 11...