विभक्तिमाला

विभक्तिमाला
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संस्कृत में विभक्ति और लकार का बहुत महत्व है. जहाॅं शब्दों के रूप विभक्ति के अनुसार धारण करते हैं क्रिया का रूप काल के अनुसार बदलता रहता है जिसे लकार कहते हैं.
संस्कृत में मुख्य रूप से सात कारक विभक्तियाँ होती हैं, जो क्रिया के साथ संज्ञा के विभिन्न संबंधों को दर्शाती हैं: 
प्रथमा: कर्ता कारक (चिह्न: ने). 
द्वितीया: कर्म कारक (चिह्न: को). 
तृतीया: करण कारक (साधन) (चिह्न: से, के द्वारा). 
चतुर्थी: सम्प्रदान कारक (देने या लेने के लिए). 
पंचमी: अपादान कारक (अलगाव या दूरी दर्शाने के लिए). 
षष्ठी: संबंध कारक (संबंध बताने के लिए). 
सप्तमी: अधिकरण कारक (स्थान या समय बताने के लिए). 
इनके अतिरिक्त एक संबोधन भी होता है. 
संक्षेप में, विभक्ति शब्दों को वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ती है, जिससे वाक्य में व्याकरणिक संबंध और अर्थ स्पष्ट होता है.
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निम्न श्लोकों में शब्दों में क्रम से सातो विभक्तियों का प्रयोग देखना रोचक है.    
         प्रस्तुत संकलन का उद्देश्य भी इसी को प्रदर्शित करना है.
अतः इसे विभक्तिमाला शीर्षक दिया गया है.
**प्रथमा विभक्ति**
१.धर्मो जयति न अधर्म: सत्यं जयति न अनृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो देवो जयति न असुर:।।
अर्थ-अंतत:धर्म की जय होती है न कि अधर्म की. सत्य की जय होती है न कि झूठ की.क्षमा जीतती है न कि क्रोध. देवता की विजय होती है न कि असुरों की.
(इस श्लोक में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग हुआ है.)
**द्वितीया विभक्ति**
वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णंवन्दे जगद्गुरूम्।।
अर्थ-कंस और चाणूर को मारने वाले देवकी को परम आनन्द प्रदान करने वाले वसुदेव पुत्र जगद्गुरु श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूॅं.
(इस लोकप्रसिद्ध श्लोक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है)
**तृतीया विभक्ति**
३.काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
   व्यसनेन तु मूर्खानाम् निद्रया कलहेन वा।।
अर्थ-विद्वान और बुद्धिमान का मनोविनोद काव्य एवं शास्त्र चर्चा में बीतता है जबकि मूर्खों का समय व्यसन, निद्रा और कलह में हीं समाप्त हो जाता है.
(इस सुप्रसिद्ध श्लोक में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है.)
**चतुर्थी विभक्ति**
४. विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति परपीड़नाय।
   खलस्य साधोर्विपरीतमेतद ज्ञानाय दानाय च रक्षनाय।।
दुष्टों की विद्या विवाद में, धन अहंकार प्रदर्शन में तथा शक्ति दूसरों को कष्ट पहुंचाने में ख़र्च होती है; इसके विपरीत सज्जन अपनी विद्या ज्ञान के प्रसार में, अपने धन का उपयोग परोपकार में तथा शक्ति का प्रयोग निर्बल की रक्षा हेतु करते हैं.
(नोट- इस श्लोक में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है)
**पंचमी विभक्ति**
५. तैलाद्रक्षेत जलाद्रक्षेत रक्षेत शिथिलबन्धनात। 
     मूर्ख हस्ते न दातव्यम् एवं वदति पुस्तकम्।।
अर्थ-पुस्तक स्वयं के बारे में कहता है कि मेरी रक्षा तेल से करो,मेरी रक्षा जल से करो तथा मेरी रक्षा ढ़ीले binding से करो. और सबसे महत्वपूर्ण बात जो मुझे कहनी है कि मुझे मूर्खों के हाथ में तो कभी न सौंपो.
(इस श्लोक में पंचमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है)
**षष्ठी विभक्ति**
६.    नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभरणं गुणों।
      गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा।।
अर्थ- मनुष्य की शोभा उसका रूप है , रूप की शोभा गुण है, गुणों की शोभा ज्ञान है तथा ज्ञान की शोभा क्षमा है.
(इस श्लोक में षष्ठी विभक्ति कि प्रयोग हुआ है)
**सप्तमी विभक्ति**
७.   आपद्काले मित्रपरीक्षा।
      शूरपरीक्षा रणांगने।।
      विनये भृत्यपरीक्षा।
      दुर्भिक्षकाले दानपरीक्षा।।
अर्थ- आपदकाल में मित्र की रणक्षेत्र में तथा सेवक की परीक्षा उसके विनय भाव में तथा दान की परीक्षा दुर्भिक्ष के समय होती है.
(इस श्लोक में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है)
 हे आदिदेव: नमस्तुभ्यम् प्रसीद मम भास्कर।
  दिवाकर: नमस्तुभ्यम प्रभाकर: नमोस्तुते।।
            (सम्बोधन)
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इससे भी रोचक तो रामरक्षा स्तोत्र का वह एक श्लोक है जिसमें सातो विभक्तियों का प्रयोग एक साथ हुआ है.
देखिए-
रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेणाभिहिता निशाचर चमू रामाय तस्मै नमः।।
रामन्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर:।।
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बाल्मीकि रामायण महात्म्य का एक और श्लोक देखिए जिसमें राम शब्द रूप की सातो विभक्तियां सन्निहित हैं----
श्री राम शरणम् समस्तजगतां।
रामं विना का गती:।।
रामेण प्रतिहन्यते कलिमलं।
रामाय कार्यं नम:।।
रामात् त्रस्यति कालभीमभुजगो। 
रामस्य सर्वं वशे ।‌।
रामे भक्तिर्खण्डिता भवतु मे।
हे राम! त्वमेवाश्रय:।।

अर्थ- श्री रामचंद्र जी समस्त संसार को शरण देने वाले हैं, श्री राम के बिना दूसरी कौन सी गति है. श्रीराम कलियुग के समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं; अतः श्री रामचंद्र जी को नमस्कार करना चाहिए.श्रीराम से कालरूपी भयंकर सर्प भी डरता है. जगत का सब कुछ श्रीराम के वश में है. श्रीराम में मेरी अखंड भक्ति बनी रहे. हे राम! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं.

राजीव रंजन प्रभाकर. 
२२.०८.२०२५.

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