डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना

डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना 
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क्या आपने नदी अथवा तालाब में डूबते हुए को किसी व्यक्ति द्वारा डूबते का हाथ पकड़कर बचाते हुए देखा है? 
नहीं न!
कारण स्पष्ट है. हाथ पकड़कर डूबते हुए को बचाने का प्रयास करने वाले की स्वयं भी डूब जाने की पूरी गारंटी है.
 क्योंकि डूबने वाला उसे जोर से पकड़ लेता है और परिणाम है कि वह बचाने वाले को भी अपनी ओर खींच लेता है. 
इस प्रकार वह स्वयं तो डूबता हीं है बचाने वाले को भी डूबो देता है. 
यही कारण है कि जो किसी डूबते हुए को बचाने का प्रयत्न करता है वह दूर से कोई वस्त्र अथवा डोरी डूबने वाले की तरफ फेंक कर उसे पकड़ने का इशारा करता है ताकि दूसरे छोर को खींच कर उसे बचाया जा सके.
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एक सर्वसमर्थ प्रभु श्रीराम हीं ऐसे हैं जो भवसागर में डूबते हुए अपने सेवक जो उन पर हीं पूरी तरह से आश्रित रहता है, उसे उसका हाथ पकड़कर कर बाहर खींच लेते हैं. 
साधारण नदी, तड़ागों की बात कौन कहे वे चाहें तो भवसागर में डूबते उतराते अपने भक्तों को हाथ पकड़कर कर भवसागर से उबारकर उसे अपना लेते हैं.
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इस तथ्य को स्वयं भरत जी ने अपना अनुभव अपने हीं श्रीमुख से बताया है.

भगवान श्रीराम लंका विजय के बाद अयोध्या आए. चौदह वर्ष के विरह समुद्र में डूबते उतराते से विह्वल भरतजी अपने स्वामी भगवान श्रीराम को देखते हीं अश्रुपूरित नेत्रों से प्रभु के चरण पकड़ कर रोते हुए कहने लगे.

ग्रंथ रत्न श्रीरामचरितमानस के उत्तर काण्ड का प्रसंग देखिए-
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।
स्यामल गात रोम भ‌ए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।

(भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं.तब कृपा सिंधु श्रीरामजी ने उन्हें जबरदस्ती हृदय से लगा लिया. उनके साॅंवले शरीर पर रोऍं खड़े हो गये. नवीन कमल के समान नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ गई.)

 बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आव‌ई।
 सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पाव‌ई।।
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अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।।

(कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजी के मुख से वचन शीघ्र नहीं निकल रहे हैं.
इस दृश्य को शिवजी अपनी भार्या पार्वती से इस प्रकार वर्णन कर रहे हैं–
हे पार्वती! सुनो, वह सुख जो उस समय भरतजी को मिल रहा था वह वचन और मन से परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है. 
भरतजी ने कहा–हे कौशलनाथ! आपने आर्त्त(दुःखी) जानकर इस दास को दर्शन दिए, इससे अब मेरे कुशल हीं कुशल है. 
हे नाथ! विरह समुद्र में डूबते हुए मुझको आपने हाथ पकड़कर बचा लिया.)
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इसीलिए विश्वेश शिव स्वयं अपना मत श्रीराम के प्रति इस प्रकार प्रकट कर अपनी पत्नी उमा से कहते हैं-

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। 
मत हमार अस सुनहि सयानी।।
हे सयानी! सुनो, हमारा तो यह मत है कि बुद्धि,मन और वाणी से श्रीरामचन्द्रजी की तर्कना नहीं की जा सकती.
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सचमुच भगवान के अवतार लेने के अनेक कारण हैं. कोई एक कारण तो है ही नहीं.
किन्तु उनमें से एक मुख्य कारण यह भी है कि वे अपने भक्तों के उद्धार हेतु भी अवतार लेते हैं.

~ राजीव रंजन प्रभाकर 
    २८.०९.२०२५.

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