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गणेशजी के फुसलेबाक लेल

पार्वती'क होरिल शिव'क दुलरूआ माए'क कोरा सॅं उठू हमर गणेश बौआ कार्तिक के छोटकू मोदक के पेटू विघ्न'क गलघोंटू हमर गणपति बौआ शुभकार्य'क हेतु हमर गजानन बौआ चलू हम अहाॅं के मोदक देब यौ गणेश बौआ                    ***       [होरिल-कोरा'क लेधूरिया बालक जे अखन तैक माए'क दूध पिबैत हो       लेधूरिया- धूरा-माइट में लेटाइ वला बच्चा        माए'क कोरा- माॅं के गोदी        मोदक- लड्डू ]                        (स्वरचित)            ~राजीव रंजन प्रभाकर

मैथिली भाषा'क किछु मौलिक शब्द पर चर्चा

गाम से एक गोटे आयल छला. हमर बेटी हुनका पैर छूबि प्रणाम केलक.  ओ आशीर्वाद दैत कहलैन- नीके रहू. ओ अभ्यागत हमरा से पूछलैन-इ अपने’क कनकिरबी थिक? हम कहलिए-हॅं ओ-वाह, बड्ड नीक. जखन ओ गेलैथ तऽ हमर बेटी हमरा सॅं पूछलक-पापा ‘कनकिरबी’ मतलब बेटी होता है?  हम- हाॅं,और कनकिरबा का अर्थ बेटा. बेटी- मैं अनुमान से समझ गई थी. यद्यपि हमर बेटी’के मैथिली बाजै लै आबै छै. किंतु सामान्य बोलचाल में एहि तरह शब्द’क प्रयोग हमहूॅं तऽ बुझू नहिए करैत छी ते ओ कोना बुझैत.अस्तु ********************************************** आय काल्हि जे मैथिली बजनिहार छैथ सेहो मैथिली भाषा केर बहुत रास शब्द सॅं जेना अनभिज्ञे बुझू. एकर अनुभव यदा-कदा हमरा होयत रहैत अछि. आब मैथिल सब जे छैथ उहो मैथिली बाजैत काल में ‘जलखै’ के ब्रेकफास्ट/नाश्ता बजै छैथ तथा ‘भानस’ के रसोई. तहिना ‘भंसाघर’ आजुक दिन में ‘किचन’ कहि सम्बोधित होयत अछि.  एहि तरहे बहुत रास मैथिली भाषा केर मूल शब्द मैथिलियो भाषा’क बोली-चाली में प्रयोग उत्तरोत्तर कम होयत जा रहल अछि. कथा साहित्य में ध्यान देला पर कत‌उ-कत‌उ अवश्य भेंट भऽ सकैछ किंतु बोली चाली में तऽ नहिए’क ब...

नारायणस्मरणस्त्रोत

नारायणस्मरणस्त्रोत. *************************** १.नारायण पादपंकजम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। २.लोक वेद रक्षकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ३.चित्तशुद्धि कारकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌ ४.संसारतापशमनकारणम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ५.सुखसमृद्धिकारकम्।  नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ६.हरस्वामीसखासेवकम्।   नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ७.रामरामेतिमंत्रमुच्चरण्। कदा सुखी भवाम्यहम्।।          नारायण पादपंकजम्।          नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌।                      (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर *** १.श्रीमन्नारायण के पदकमल को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. २.लोक और वेद के रक्षक को  मैं प्रणाम करता हूॅं, में प्रणाम करता हूॅं. ३.चित् के शुद्धिकर्ता को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ४.संसार-ताप के शमनकारण को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ५.सुखसमृद्धि के कारक को  मैं प्रणाम करता हूॅं,मैं प्रणाम करता ...

जो ला न सको छ: तुम तो

जो ला न सको छ: तो अपनों की गोटी हीं काटो मौका़' देखकर जैसे भी हो अपनी गोटी लाल करो                   ** अच्छी-अच्छी बातें कह वा'इज़ कहलाना मक़सूद है सबके सर में यही है सौदा यही अब वाहिद फ़तूर है                     ** कौ़ल और फे'ल में फ़र्क़ अब चौंकाने वाली बात नहीं  अगर एक सा हो मा'लूम तो फिर सहसा हो विश्वास नहीं.               ~राजीव रंजन प्रभाकर  वा'इज़-उपदेशक मक़्सूद-उद्देश्य सर-दिमाग़ सौदा-दीवानगी नुमायाॅं-प्रत्यक्ष फ़तूर- बेचैनी, खोट ख़राबी क़ौल-कथनी फ़ै'ल-करनी फ़र्क़-अंतर جو لا نہ سکو چھہ تو اپنوں کی گوٹی ہیں کاٹو موقع دیکھ کر جیسے بھی ہو اپنی گوٹی لال کرو ** اچھی-اچھی باتیں کہکر واعظ کہلانا مقصود ہے  سب کے سر میں یہی ہے سودا یہی اب نمایاں فتور ہے۔ ** قول اور فعل میں فرق اب چونکانے والی بات نہیں  اگر ایک سا ہو معلوم تو پھر سہسہ ہو وشواس نہیں۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

कभी इसके दर कभी उसके दर

कभी इसके दर कभी उसके दर यूॅं हीं दर-ब-दर जो भटकता पहुॅंचा तेरे दर देखकर तेरा अपनापन  पाकर तेरी मुहब्बत और  नज़रों में मेरा इंतज़ार  मुझे यकीं हुआ कि इस दहर में   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर.             ~राजीव रंजन प्रभाकर (दर=चौखट) (दहर=संसार) کبھی اس کے در کبھی اس کے در یوں ہیں در بہ در  جو بھٹکتا پہونچا تیرے در دیکھ کر تیرا اپناپن پاکر تیری محبت اور  نظروں میں میرا انتظار  مجھے یقیں ہوا کہ اس دہر میں  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر ۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं  ************************************** संसार में प्रायः सभी लोग ईश्वर का नामोच्चार या नाम स्मरण अनिष्ट के निवारण वा अभीष्ट की प्राप्ति के लिए हीं करते हैं.  इसके अतिरिक्त मोहमुक्त एवं नामनिष्ठ संत श्रद्धावश अपने तत्व जिज्ञासा के समाधान हेतु अथवा अपने तत्व ज्ञान के संरक्षण हेतु भी ईश्वर का नाम लेते हैं.                            *** इस प्रकार  ईश्वर का नाम लोग                   या तो भयवश                  या लोभवश                   या श्रद्धावश  लेते हैं. लेकिन ईश्वर का नाम किसी को क्रोधवश लेते नहीं सुना है.देवर्षि नारदजी अपवाद हैं. कारण साफ है कोई अपने से बलवान या सामर्थ्यवान पर क्रोध नहीं कर सकता है; यह अनुभव सिद्ध तथ्य है.        हाॅं;ईश्वर को कोसते हुए हमने जरूर सुना हैं. क्षोभ और स्तोभ दोनों में ईश्वर का नाम ...

Maturity starts with the feeling that nothing is under your control; nothing.

If you begin to feel that nothing is under your control, it means you are becoming mature metaphysically. Lust,Greed and Anger,three great enemies of the self,lose their potential the moment you truly realize that nothing is under your control.  This path of self-actualization, I feel, goes on to help you shed your false feelings that you are the doer. You can't even breathe without his will.  In fact the real doer is someone else. No matter how strong or powerful or capable or learned you are, the thing that you have planned for yourself or others is subject to His "approval". If He wants to see you successful you become so despite all odds.That is all factors act together to convert impossibility into reality. Conversely; If He wishes otherwise your endeavors will remain short of success no matter how witty, hefty or mighty you may be.  ******************************************************        R.R.Prabhakar.

प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है.

प्रभु के स्मरण मात्र से बुद्धि शुद्ध होती है. ************************************** प्रेम और व्याकुलता में प्रभु के स्मरण की तो बात हीं क्या है अपितु भय-भ्रम से, लोभ-लालच से, रोष-आक्रोश से, राग-द्वेष से, हास-परिहास से भी उनका स्मरण सदैव हित प्रद, लाभप्रद, सुखप्रद तथा शांतिप्रद होता है.  प्रभु स्मरण बुद्धि को शुद्धता प्रदान करता है.                     *** प्रभु स्मरण के संदर्भ में संस्कृत का निम्न श्लोक द्रष्टव्य है- शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् । लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा हरिं स्मरेत ॥       व्यक्ति को सौ कार्य छोड़कर पहले भोजन करना चाहिए तथा एक हजार कार्यों को छोड़कर स्नान कर लेना चाहिए तथा लाखों व्यस्तताओं को त्यागकर दान करने का सत्कार्य करना चाहिए तथा प्रभु का स्मरण तो करोड़ों काम छोड़कर करना चाहिए. आश्चर्य है कि यह जान कर भी ऐसा कर पाना प्रायः कठिन होता है. प्रायः कार्य के दबाव में घर से बिना स्नान एवं भोजन किए बाहर निकल जाना, सुपात्र व्यक्ति के सम्मुख उपस्थित होने पर सामर्थ्य के बावजूद...

श्रीराम के चरणारविन्द को तकिया समझ कर सोइए

श्रीराम के चरणारविन्द को तकिया समझ कर सोइए  समस्त चिंता फिकिर को सपने में धूल चाटते देखिए  उनके दया के मौध का ठोपे ठोप अनुपान करते रहिए समस्त आधि-व्याधि रोगादि के ठोंठ को मोके रखिए उन्हीं के कृपा प्रसाद का भोजन पकवान पाते रहिए जीवन रूपी तन-मन को हृष्ट एवं पुष्ट बनाए रखिए उन्हीं के कृपा कटाक्ष का कोट हमेशा पहने रहिए जग के समस्त ऐशन-फैशन को दाॅंत चियारे देखिए  उन्हीं के दरबार का जीवन भर मामूली चाकरी करते रहिए  अनुमान से बहुत बेसी वेतन-भत्ता उनके हाथ से पाते रहिए                            ~राजीव रंजन प्रभाकर.                                   ०३.१०.२०२५.

डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना

डूबते हुए को हाथ पकड़कर बचाना  ************************************* क्या आपने नदी अथवा तालाब में डूबते हुए को किसी व्यक्ति द्वारा डूबते का हाथ पकड़कर बचाते हुए देखा है?  नहीं न! कारण स्पष्ट है. हाथ पकड़कर डूबते हुए को बचाने का प्रयास करने वाले की स्वयं भी डूब जाने की पूरी गारंटी है.  क्योंकि डूबने वाला उसे जोर से पकड़ लेता है और परिणाम है कि वह बचाने वाले को भी अपनी ओर खींच लेता है.  इस प्रकार वह स्वयं तो डूबता हीं है बचाने वाले को भी डूबो देता है.  यही कारण है कि जो किसी डूबते हुए को बचाने का प्रयत्न करता है वह दूर से कोई वस्त्र अथवा डोरी डूबने वाले की तरफ फेंक कर उसे पकड़ने का इशारा करता है ताकि दूसरे छोर को खींच कर उसे बचाया जा सके. ********************************************** एक सर्वसमर्थ प्रभु श्रीराम हीं ऐसे हैं जो भवसागर में डूबते हुए अपने सेवक जो उन पर हीं पूरी तरह से आश्रित रहता है, उसे उसका हाथ पकड़कर कर बाहर खींच लेते हैं.  साधारण नदी, तड़ागों की बात कौन कहे वे चाहें तो भवसागर में डूबते उतराते अपने भक्तों को हाथ पकड़कर कर भवसागर से उबारकर उसे ...

हिंदी और अंग्रेजी की प्रियता का पैमाना-मेरे लिए

---हिंदी--- हिंदी मुझे प्रिय है उतना  जितना           भालू को शहद          खरगोश को गाजर           बंदर को केला          घोड़े को चना          हाथी को केतारी          बच्चे को मिठाई  अंग्रेजी मुझे उतना ही प्रिय है   जितना           स्टुडेंट को एक्जामिनेशन           एसपिरेंट्स को कम्पिटीशन           लीडर को इलेक्शन           पेशेंट को आपरेशन           विज्डम को टेम्प्टेशन          प्रोफेशनल्स को रेपुटेशन  ****       हिंदी दिवस की अनंत शुभकामनाएं             हिंदी भारत का भविष्य बने                              ...

जब और तो

जब मंज़िल का पता न हो  तो  जिस राह पर चलते जा रहे हैं  वही आख़िरत में मंज़िल बन जाती है. ** जब 'अपना' कोई न सुने दर्द  तो  जो सुनने को तैयार हो वहीं अपना कहलाती/ता है ** जब जाने वाला गिला भूल कर लौट आए  तो  उसे ठुकराना भी फिर ग़ैर वाजिब है. ** किस के दिल में क्या बसता है यही बात  तो  पहले ख़ुद के दिल से पूछना भी मुनासिब है. **       ~राजीव रंजन प्रभाकर. جب منزل کا پتہ نہ ہو  تو  جس راہ پر چلتے جا رہے  وہی آخرت میں منزل بن جاتا ہے۔ ** جب اپنا کوئی سنے ن درد  تو  جو سننے کو تیار ہو وہی اپنا کہلاتی/تا ہے  ** جب جانے والا گلا بھول کر لوٹ آئے  تو اسے ٹھکرانا بھی پھر غیر واجب ہے۔ ** اس کے دل میں کیا بستا ہے یہی بات  تو   پہلے خود کے دل سے پوچھنا بھی مناسب ہے۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

सलाह.

सलाह. ***** एक जमाना था जब लोग अपने से बड़े बुजुर्गों से सलाह लेने आया करते थे. सलाह देने वाले को भी स्वयं के महत्वपूर्ण होने का अहसास होता था.  किंतु आज स्थिति दूसरी है.   आज के इंटरनेट वो कृत्रिम प्रज्ञा(Artificial Intelligence) के इस युग ने प्रायः हर किसी को समान रूप से बुद्धिमान बना दिया है.       सभी के पास प्रायः उतनी हीं सूचना रहती है जितना दूसरों के पास. साथ हीं निर्णय लेने के लिए जितनी सूचना का होना आवश्यक होता है वह हर किसी के पास कमोवेश बराबर परिमाण में हीं रहता है.           इसलिए आज का जमाना किसी को सलाह देने का नहीं रह गया है. ***************************************  वैसे तो बिना मांगे सलाह देना नहीं चाहिए; मेरे विचार से तो अब मांगने पर भी नहीं देना चाहिए. इधर-उधर की बात कर के टाल देना चाहिए.               जानते हैं क्यों?  सलाह मांगने वाला अपना निर्णय पहले हीं ले चुका होता है. आपसे सलाह मांग कर वह आपका सिर्फ व्यू प्वाइंट जानना चाहता है.        ...

Oh Sanskrit !

Oh Sanskrit! I didn't give you your due while I was a student.  I thought you to be merely a language of little relevance in view of my inclination to pursue science in college. You appeared to me as a load to get rid of by passing the exam anyway. Moreover,for long as a student and many years even after that,I remained under the impression that you are the language of rituals. More deplorably,I associated you,not without reason,with a particular section of society.  How mistaken I was to remain under such a falsely concluded impression!           As I grew up I began to feel your true worth in shaping an individual as a worthy member of the society. Slowly slowly as I started enhancing acquaintance with you I realised that - 1.You are not just a language but much more than that. While other languages are mere mediums of communication you are the creator and nourisher of all that is good in an individual. 2.While other languages compete unhealthily wit...

वैसी ही मेरी सीरत-वैसी ही मेरी सूरत

पढ़ कर मेरी नज़्में  मत लगाना मेरे तू सीरत का अंदाज़ा  जिस वक़्त जैसी  दिमाग़ी कैफियत वैसी हीं मेरी सीरत वैसी ही मेरी सूरत  वैसी हीं मेरी फितरत  वैसी हीं मेरी नज़्में  वैसे हीं मेरे रब्त़ वैसे हीं मेरे ज़ब्त.                       ~राजीव रंजन प्रभाकर                               ३१.०८.२०२५ پڑہ کر میری نظمیں  مت لگانا میرے تو  سیرت کا اندازہ۔ جس وقت جیسی  دماغی کیفیت  ویسی ہی میری سیرت  ویسی ہی میری صورت  ویسی ہی میری فطرت  ویسی ہی میری نظمیں  ویسے ہیں میرے ربط ویسے ہیں میرے ضبط۔  نظم و ربط ضبط ۔ ***************************       بصد شوق  ~راجیو رنجن پربھاکر

विभक्तिमाला

विभक्तिमाला ******************************* संस्कृत में विभक्ति और लकार का बहुत महत्व है. जहाॅं शब्दों के रूप विभक्ति के अनुसार धारण करते हैं क्रिया का रूप काल के अनुसार बदलता रहता है जिसे लकार कहते हैं. संस्कृत में मुख्य रूप से सात कारक विभक्तियाँ होती हैं, जो क्रिया के साथ संज्ञा के विभिन्न संबंधों को दर्शाती हैं:  प्रथमा: कर्ता कारक (चिह्न: ने).  द्वितीया: कर्म कारक (चिह्न: को).  तृतीया: करण कारक (साधन) (चिह्न: से, के द्वारा).  चतुर्थी: सम्प्रदान कारक (देने या लेने के लिए).  पंचमी: अपादान कारक (अलगाव या दूरी दर्शाने के लिए).  षष्ठी: संबंध कारक (संबंध बताने के लिए).  सप्तमी: अधिकरण कारक (स्थान या समय बताने के लिए).  इनके अतिरिक्त एक संबोधन भी होता है.  संक्षेप में, विभक्ति शब्दों को वाक्य के अन्य शब्दों से जोड़ती है, जिससे वाक्य में व्याकरणिक संबंध और अर्थ स्पष्ट होता है. ******************************* निम्न श्लोकों में शब्दों में क्रम से सातो विभक्तियों का प्रयोग देखना रोचक है.              प्रस्तुत...

आप कौन हैं ?

आप कौन हैं? मैं एक प्राणी हूॅं.  'अजीब बात है ये कोई जवाब हुआ! प्राणि तो सभी हैं. मेरा मतलब है कि हैं कौन? मैं एक मनुष्य हूॅं  देखिए आप बात को घुमाने की कोशिश मत कीजिए. मेरा आप से कौन हैं, से मेरा पूछने का तात्पर्य यह है कि आप का 'नाम' क्या है, 'कहाॅं' रहते हैं, 'क्या' करते हैं वग़ैरह वग़ैरह.  आप से पूछा जा रहा है तो आप भाव खा रहे हैं जी? मेरा नाम अ.ब.स है मैं धरती पर रहता हूॅं और जीने के लिए काम करता हूॅं. तो आकाश में कौन रहता है?  रहता है न? कितने हीं पक्षी हैं जिनका आशियाना यह मुक्ताकाश है. ऐसे प्राणी नभचर कहलाते हैं. ज्यादा बनिए नहीं आप अपना परिचय ठीक से दीजिए; समझ गये न? मेरा नाम अ.ब.स है, मैं क.ख.ग शहर में रहता हूॅं और सरकार का एक मुलाज़िम हूॅं. वो तो ठीक है लेकिन इस परिचय में भी कमी हीं रह गया है.  मतलब केंद्र सरकार में कि राज्य सरकार में?  राज्य सरकार में. मतलब इतने से हो गया परिचय? राज्य सरकार के किस सेवा सम्वर्ग से हैं, किस विभाग में आदि आदि.  आप या तो बहुत चालाक हैं या अत्यंत मंदबुद्धि.  मंदबुद्धि तो आप दिखते नहीं फिर आप चालाकी कर रहे ...

संस्कृत दिवसे किंचित मम भावोद्गार:

अद्य श्रावण मासस्य पूर्णिमा तिथि:। प्रायः सर्वे जना: इयम तिथिम् रक्षा बंधन पर्वरूपेण जानन्ति.  किंतु अस्येतर: इयम तिथि विद्वानस: संस्कृत दिवस रूपेण अपि प्रतिष्ठितवान.  तर्हि प्रत्येक सम्वत्सरे इयम तिथि: संस्कृत दिवसाय आरक्षित:। सम्पूर्ण विश्वे संस्कृत भाषा तुल्य: न कोऽपि भाषा प्राचीनतमा विद्यते.  सर्वे भारतवासिन: कृते अयम गर्वविषयक तथ्य: यत् अस्या भाषाया: उद्गमस्त्रोत वेदा: वर्तते अपि च अस्य उद्गम स्थल: भारतस्य पुण्य भूमि.  सनातन धर्मस्य सम्पूर्ण वाड्मय संस्कृत भाषायाम् रचितं विद्यते।  वेदा: उपनिषद्श्च स्मृतिश्च मंत्रश्च संस्कृत भाषायाम् रचित कारणे यदि कोऽपि इयम भाषायै: सनातन धर्मधारिणी भाषा वदति इदम् न किंचित अतिशयोक्ति। प्राचीन काले संस्कृत भाषैव लोक व्यवहारस्य भाषाऽपि आसीत।  गुप्त काले संस्कृत भाषा लोक व्यवहारस्य शासनव्यवहारस्यश्च भाषा अपि आसीत।    कालक्रमे अस्य प्रसार: लोकानाम् क्रमशः क्षीणताम् प्राप्त:। वैज्ञानिक दृष्टया अपि च इयम भाषाया: प्रामाणिकता उपादेयता च अद्य निर्विवाद रूपेण प्रतिष्ठित:। अधुना संगणक(computer) विषयै: कृत्रिम प्रज्ञा(Ar...

कश्मकश

कश्मकश  ***************************** बोलूॅं तो वबाल हो, चुप रहूॅं तो सवाल हो. या रब मेरे तूॅं ही बता अब, आख़िर कैसा मेरा आ'माल हो?      ~राजीव रंजन प्रभाकर  کشمکش  ***************************** بولوں تو وبلا ہو چپ رہوں تو سوال ہو یا رب میرے تو ہی بتا اب آخر کیسا میرا اعمال ہو؟ ~ بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

America's Diplomacy: Veering Towards a New Normal.

America's Diplomacy is trying to shift itself towards a new normal. Words that are used for gaining edge over the others are far from diplomatic.  Words indicative of hubris and intimidations are issued as political statements even during peace times. We have known altercation as an anathema to diplomacy.   However altercation in open is more frequent and is being given a favour to be recognised as a way of talk on the diplomatic table. We have already seen America doing this while talking to Ukraine. These days America is in great haste. It is now not only in the role of a self- assumed global leader but global arbitrator also with a patent ambition to be recognised as a harbinger of peace and hegemony together at the same time. Their power borne hubris has tattered even the minimum diplomatic courtesy.            Diplomatic nuances stand substituted by clear cut ludicrous intimidatory language that even the spokesperson of the foreign secre...