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Showing posts from January, 2026

क: कुत्र मित्र:?

विद्या मित्रं प्रवासेषु, भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ अर्थ: बाहर विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, बीमार व्यक्ति के लिए औषधि मित्र होती है और मृतक के लिए धर्म ही उसका परम मित्र है.

बसंतागत:

माघान्ते आगच्छति फाल्गुन:। हिंदू पंचांगानुसारे फाल्गुन मास: वर्षस्य अंत: अपि च चैत्र मास: भवति वर्षारंभ:। परन्तु बसंत ऋतो: विस्तार माघ शुक्ल पक्षात चैत्र शुक्ल पक्ष पर्यंत परिगण्यते. तदर्थे वर्षांतश्च वर्षारम्भ: उभौ भवतौ बसंत ऋतवे.               *** यदा पौष-माघ द्वयो मासौ अति शैत्यम् हेतवे जनजीवनम् अत्यंत शिथिलम् जायते तदा प्रकृति: उपहारस्वरुप बसंतरूपेण आगत्य जीवने ऊर्जा संचारम् करोति.  यदस्ति सूचक: शैत्यावसान: अपि च निदाघस्य आगमनम् असौ बसंत:।       तर्हि एतस्मिन वयम् अनुभवाम: खंडित शैत्यम खंडित ग्रीष्मम्। सूर्योदय: भवति क्वचित पूर्वम् ।तदर्थे दिवावधि क्रमशः दीर्घकालिक जायते.       *** बसंत: भवति कुसुमाकर:।  भगवद्गीतायां भगवान् स्वतुलना कुसुमाकरेण अकरोत-" "मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर:" नव द्रुम: पत्रेण-पल्लवेन सज्जते.  प्राप्ते बसंत: वृक्षानाम शाखा: पत्रै: पुष्पै: फलै:च शोभन्ते.              *** माघ शुक्ल पंचमी तिथौ विद्यार्थिन: सरस्वती पूजा आयोजनम् कुर्वन्ति. विद...

शाश्वत

   यदासीत अतीते  यदभविष्यति भविष्ये  अपि च वर्तमाने विद्यमानम् वदन्ति विद्वांसश्च शास्त्राणि तन्नेतिनित्यमनिरंतरमभीक्षणम्

राम नाम खेती की तैयारी

मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. १.इस खेती में लागत कुछ ना  उपज होत है बड़ी भारी इस खेती का मोल अमोल है न कोई जमींदार की बटाईदारी मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. २.इस खेती में न कोई जुताई न कोई निराई और गुड़ाई न कोई हल-बैल न हिं ट्रैक्टर न कोई सिंचाई  मनवाॅं कर ले तू राम नाम खेती की तैयारी. ३.इस खेती में न कोई ईति भीति न कोई पहरेदारी न कोई चिरौरी खाद-बीजन खातिर साहिबन के और न उन कर खातिरदारी  मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.  ४.इस खेती में न फिकिर बिक्री के  न कोई दाही जारी और न केकरो देनदारी       मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी     ५.रामनाम बीज छींटता जा साॅंस से  है ये परम कल्याणकारी  साधो!इसी में छिपी है गती तुम्हारी मनवाॅं कर ले तूॅं राम नाम खेती की तैयारी.            (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर दाही-जारी--बाढ़ और सूखा ईति भीति- ये शास्त्र में छ: बताए गए हैं-         *अधिक जल बरसना,...

एकांत

एकांत आनन्द का अक्षय स्रोत है और भीड़जन्य अकेलापन दुःख का हेतु  राजीव रंजन प्रभाकर  १८.०१.२०२६.

मूर्ख विद्वान तुलना

वरम् अस्ति तूष्णीम् भूत्वा जनानाम् दृष्टौ मूर्खम्   न तु विद्वानाख्यां हेतो जनमध्ये विवादसृजनम्

मूर्ख बनाम विद्वान

चुप रहकर मूर्ख कहलाना विद्वान बनकर विवाद उत्पन्न करने से श्रेयस्कर है 

मकरप्राप्त भाष्करस्य तेज:

मकरप्राप्त भाष्करस्य यथा तेज: वर्धते। तथा भवतां तेज: वर्धते इति कामये।।         *** जिस प्रकार मकर राशि में प्रवेश करते हीं भगवान सूर्यदेव का तेज बढ़ता हीं जाता है उसी प्रकार आपके तेज(आरोग्य, बल,धैर्य,शील क्षमता,यश,कीर्ति एवं शौर्य) में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो,ऐसी कामना है. ~राजीव रंजन प्रभाकर.

लहज़ा तल्ख़ चेहरा सख़्त

लहज़ा तल्ख़ चेहरा सख़्त ओहदा ऊॅंचा ढ़ीला नफ़्स अकड़ ऐसा मानो हो सूखा शजर न दे कोई छाउॅं न कोई समर हो जब ऐसा हाकिम-ए-तख्त मत जाओ ऐसे साहब के दर            ~राजीव रंजन प्रभाकर  [शजर-पेड़ समर-फल तल्ख़- स्वभाव की उग्रता  लहज़ा-बात करने व पेश आने का ढ़ंग  नफ़्स-इंद्रिय संयम(आत्मनियंत्रण) दर-चौखट/दरवाज़ा  हाकिम-ए-तख्त-कुर्सी पर काबिज़ साहब]  لہجہ تلخ چہرا سخت  عہدہ اونچہ دھیلا نفس اکڑ ایسا مانو ہو سوکھا شجر نہ دے کوئی چھاؤں نہ کوئی ثمر  ہو جب ایسا حاکم تخت مت جاؤ ایسے صاحب کے در ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

रातें सर्द चेहरा ज़र्द

रातें सर्द चेहरा ज़र्द  लिहाफ़ भी नदारद  या ख़ुदा तूने ठंड दिया  तो साथ में  लिहाफ़ व ग़िलाफ़ भी दे. लिहाफ़-ग़िलाफ़ मुश्किल हो तो  तो कम-से-कम एक कम्बल हीं दे दे; कम्बल भी मुमकिन नहीं तो  तो फ़क़त एक चादर हीं दे.  चादर-कंबल पाने का भी मैं क़ाबिल नहीं  तो कम-से-कम  क़ाबिल-ए-बर्दाश्त हौसला हीं दे. *** लेकिन दे; क्योंकि  देना है तुम्हारी सिफ़त  और लेना है  इस नाचीज़ की 'आदत. ~राजीव रंजन प्रभाकर. راتیں سرد چہرا زرد  لہاف بھی ندارد  یا خدا! تونے ٹھنڈ دیا  تو ساتھ میں  لہاف و غلاف بھی دے لہاف-غلاف مشکل ہو تو  کم-سے-کم ایک کمبل ہیں دے دے کمبل بھی ممکن نہیں تو  فقط ایک چادر ہیں دے چادر-کمبل پانے کا بھی   میں قابل نہیں  تو کم سے کم قابل برداشت  حوصلہ ہیں دے ** لیکن دے،کیونکہ دینا ہے تمہاری صفت اور لینا ہے  اس ناچیز کی عادت۔ بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

मित्रों! यह संसार एक सिनेमा है.

मित्रों!यह संसार एक सिनेमा है. सिनेमा का मुझे हीरो नहीं बनना है. अभिनेता भी नहीं बनना है.  न साइड रोल कोई करना है. केवल बैठकर चुपचाप इसे देखने की चाहना है.  निर्माता-सह-निर्देशक के निर्माण-निर्देशन को कोशिश कर समझना है.  समझ नहीं पाने पर घर जाकर सो जाना है. सोना, उठकर बैठ देखना और सोचना  फिर भी निर्देशन की बारिकियों को समझ नहीं पाना है. तब भी जीवन भर यही क्रिया दुहराना है. मित्रों! यह संसार एक सिनेमा है.              ~राजीव रंजन प्रभाकर.

हे प्रभु! देहि मे तद्जीवनम्

हे प्रभु!  देहि मे तद् जीवनम् । यद्भवति तव आश्रितम् ।। देहि मे तद्धैर्यम्। योऽस्ति विना दैन्यम् च पलायनम्।। देहि मे तद् सौख्यम्।  योऽस्ति अन्येषु विना क्लेषोत्पादकम्।। देहि मे तद् गुरूता। यद्भवति रहित यांच्या।।  देहि मे तद् लघुता। यद्शक्नोतिस्पर्शम् तव पादुका।।                  (स्वरचित)           ~राजीव रंजन प्रभाकर. *** O God! Give me that life which is dependent on You. Give me that patience that fights helplessness or timidity driven avoidance either. Give me that pleasure which doesn't produce pain to others. Give me that gravity which comes without cravings from anyone for anything. Give me that smallness that is able to touch your feet only.             ~R.R.Prabhakar.