अर्थ विज्ञान.
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यदि आपने इस रूचि से कि प्रस्तुत लेखन धनप्राप्ति विषयक है तो इसे आगे पढ़ना छोड़ भी सकते हैं.
इसका कारण यह है कि प्रस्तुत आलेख धनविषयक न होकर शब्दार्थ विषयक है. निम्न पंक्तियों में उन पहलुओं पर विचार किया गया है जिसमें कोई शब्द अपना अर्थ किस प्रकार ग्रहण करता है या कहिए कि वे कौन से साधन है जो किसी शब्द का अर्थ उस रूप में प्रकाशित करता है जो किसी लेखक या वक्ता का अभीष्ट है.
इन पहलुओं की चर्चा मोटे तौर पर भाषा-विज्ञान के अंतर्गत की जाती है. अर्थ विज्ञान भाषा विज्ञान का हीं एक अवयव है.
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अब यहीं लीजिए.
"अर्थ" शब्द का अर्थ "धन" भी है और "आशय" या कहिए "मतलब" भी अब यह शब्द कब कौन अर्थ ग्रहण करेगा यह संदर्भ (context) पर निर्भर है.
अतः यह स्पष्ट हुआ कि शब्द के अर्थ को प्रकाशित करने में संदर्भ एक महत्वपूर्ण साधन है. इसी तरह के अन्य साधनों की चर्चा प्रस्तुत लेख का अभीष्ट है.
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कोई शब्द जिनके सहारे अपना अर्थ ग्रहण करता है, वे साधन निम्न हैं—-
१.व्यवहार- यह किसी शब्द का अर्थ-बोध कराने का पहला साधन है. इसमें किसी शब्द के संदर्भ में गुरूजन द्वारा उस वस्तु को दिखा कर बोध कराने का प्रयत्न किया जाता है.
उदाहरण के लिए "फूल", टेबुल, खिड़की, ईंट,किवार, तोता आदि ऐसे अनेक शब्द हैं जिनसे किन चीजों का बोध होता है,उनका सर्वोत्तम ज्ञान व्यवहार में साक्षात्कार कराये जाने पर हीं सम्भव है. तब जैसे हीं कोई उन शब्दों को हमारे समक्ष बोलता या लिखता है, हमारे मानस पटल पर उसकी आकृति उभर आती है.
कहने की आवश्यकता नहीं है कि ये रूढ़ शब्द हैं.इनकी उत्पत्ति कैसे हुई,यह प्रस्तुत आलेख की विषय वस्तु नहीं है. यहां उन शब्दों का बोध किन माध्यमों से होता है,उससे अवगत होना है.
२.आप्तवाक्य- लेकिन ये जानना रोचक है कि "व्यवहार" की अर्थ ग्रहण कराने की अपनी एक सीमा है. सभी शब्दों का अर्थबोध व्यवहार से सम्भव नहीं है.
उदाहरण के लिए "ईश्वर" शब्द को हीं लें.
जाहिर है इस धरातल पर"ईश्वर" नामक कोई दृष्टिगोचर या स्पर्शगोचर वस्तु नहीं है जिसका इस शब्द से सीधा सम्बन्ध हो तथा जिसके साक्षात्कार से उसकी रूप रंग आकार,आकृति आदि का बोध निर्विवाद रूप से हो जाय.
तब इस शब्द के अर्थ का बोध कराने हेतु हम जिस माध्यम का सहारा लेते हैं, उन्हें आप्त वाक्य कहते हैं.
आप्त वाक्य ऐसे वक्ता का कथन होता है जिन्होंने उन शब्दों के सम्बन्ध में अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त किया हो और वह उसे उसी रूप में कहे जैसा कि उसने अनुभव किया हो. अपनी तरफ से न कुछ बढ़ाये न घटाये.
३.उपमान- अर्थ के ज्ञान का एक और साधन है कि जिस शब्द का अर्थ हम नहीं जानते हैं अर्थात् उस अज्ञात शब्द से मिलता-जुलता कोई अन्य शब्द का यदि हमें पूर्व से ज्ञान है तो उस अज्ञात शब्द का भी अर्थ हमें ज्ञात शब्द से हो जाता है.
किसी अज्ञात वस्तु को किसी ज्ञात वस्तु की समानता के आधार पर किसी नाम से जानना उपमान कहलाता है.जैसे किसी को मालूम है कि नीलगाय, गाय जैसी होती है; कभी उसने जंगल में गाय जैसा पशु देखा और समझ गया कि यही नीलगाय है. यह ज्ञान गाय के ज्ञान से हुआ है.किंतु शब्दज्ञान से इसमें भेद है.शब्दज्ञान से शब्द सुनकर बोध होता है, उपमान में समानता से बोध होता है.
४.वाक्यशेष या प्रकरण - जब एक शब्द के अनेक अर्थ हों तो उस शब्द का अर्थ प्रसंग से निर्धारित होता है. इसका उदाहरण तो हम आरंभ में हीं दे चुके हैं जब यह कहा गया कि उपरोक्त अर्थ- विज्ञान विषयक लेख धनार्थी को लक्ष्य कर नहीं लिखा जा रहा है जो स्वभाववश "अर्थ" का आशय धन से लगाते हैं.
उपरोक्त अर्थ-विज्ञान में प्रयुक्त "अर्थ" शब्द ज्ञानार्थी के निमित्त है.
अब "रस" शब्द को ही लीजिए. इसका अर्थ आनंद, शरबत, मदिरा,भोज्यपदार्थ के छः स्वाद एवं काव्य के नौ रस तक हो सकते हैं. अब यह "रस" शब्द कौन सा अर्थ कब ग्रहण करेगा यह निर्भर करता है कि इसका वाक्य में प्रयोग (वाक्य-शेष) किस "प्रकरण"(context) में हुआ है.
तो यह स्पष्ट हुआ कि एक से अधिक अर्थ वाले शब्द का आशय तब तक ठीक-ठीक नहीं चल सकता जब तक उसका वाक्य में प्रयोग न किया जाए. इसलिए अर्थ प्रतीति का प्रकरण या वाक्य-शेष एक महत्वपूर्ण साधन है.
(***प्रसंगवश भोजन के छः रस और काव्य के नौ रस निम्न हैं-
भोजन विषयक छः रस (छ-रस) ये हैं- मधुर (मीठा), लवण (नमकीन), अम्ल (खट्टा), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला)
काव्यविषयक नौ रस ये हैं-
1) श्रृंगार (संयोग व विप्रलम्भ) रस, (2) हास्य रस, (3) करुण रस, (4) वीर रस, (5) रौद्र रस, (6) भयानक रस, (7) वीभत्स रस, (8) अद्भुत रस तथा (9) शान्त रस.)
५. विवृत्ति- किसी शब्द का अर्थ प्रकाशित करने हेतु विवरण या व्याख्या का सहारा लेना पड़ता है.
उदाहरण के लिए रीति का अर्थ स्पष्ट होने के लिए एक शब्द पर्याप्त नहीं है. इसके लिए हमें विवरण या व्याख्या का आश्रय लेना होगा जैसे पद- रचना की किसी विशिष्ट पद्धति को "रीति" कहते हैं या लोक व्यवहार की विशिष्ट परम्परा जिसका पालन लोग सदियों से करते आ रहे हों इत्यादि.
कहने का तात्पर्य यह है कि किसी शब्द के अर्थ को प्रकाशित करने हेतु हमें किसी प्रकार की व्याख्या करनी पड़े तो वैसी स्थिति में हम उस शब्द के अर्थ ग्रहण कराने वाले साधन को विवृत्ति कहेंगे.
६. प्रसिद्ध पद का सान्निध्य- अर्थ ज्ञान का यह भी एक महत्वपूर्ण साधन है. मान लीजिए हम किसी पत्रिका या समाचार-पत्र में पढ़ने के दरम्यान कोई ऐसा शब्द पाते हैं जिनका अर्थ हमें मालूम नहीं रहता है. तो क्या हम तुरंत उसे जानने के लिए शब्द-कोष लेने के लिए घर या अलमारी का रूख करते हैं? नहीं न! हम उस अज्ञात शब्द का आशय उस शब्द की सन्निधि अर्थात आगे-पीछे में प्रयुक्त प्रसिद्ध शब्द के आधार पर लगा लेते हैं. इसे Backward & Forward linkage method of finding meaning of a word कह सकते हैं.
वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उस अनजान शब्द का अर्थ जानने के लिए इतने उत्साहित एवं उत्सुक रहते हैं कि वे तत्काल डिक्शनरी का सहारा लेने हेतु सदैव उद्यत रहते हैं. ऐसे व्यक्ति शब्द सामर्थ्य से परिपूर्ण होते हैं. अब तो हमारे मोबाइल में भी डिक्शनरी रखने की सुविधा हो गई है. किसी शब्द का अर्थ जानने के लिए एक क्लिक काफी है.
७. व्याकरण-
कई शब्द ऐसे हैं जिनका अर्थ हमें तब तक पता नहीं चल सकता जब तक हमें व्याकरण का समुचित ज्ञान न हो. हम "जाना" या "करना" का अर्थ तो जान सकते हैं किंतु "किया" या "गया" या "जाएगा" आदि शब्दों का अर्थ बिना व्याकरण ज्ञान के सम्भव नहीं है. "गया", "किया", "जायेगा" किसी शब्द के कालवाची रूप हैं जो प्रायः शब्दकोश में नहीं मिलते क्योंकि वे शब्द-कोष की विषयवस्तु न होकर व्याकरण की हैं.
इसके सही ज्ञान के लिए व्याकरण हीं साधनरूप है.
अत: किसी शब्दार्थ ज्ञान में व्याकरण का भी एक साधन के तौर पर अपना महत्व है.
८.शब्दकोश- प्रायः जिस शब्द से हम अपरिचित रहते हैं उसका अर्थ जानने के लिए हम शब्दकोश का हीं सहारा लेते हैं.
हम जानते हैं कि शब्द के चलन का भी अपना एक दौर होता है. एक खास अवधि के बाद कोई कोई शब्द चलन से बाहर हो जाते हैं. उनके अल्प या न के बराबर प्रयोग होने से लोगों को उनका अर्थ प्रायः पता नहीं रहता है. यदि किसी को उस शब्द का दैववश साक्षात्कार होता है तो वैसी स्थिति में उसे शब्दकोश का हीं आश्रय लेना पड़ता है. एक अच्छे शब्दकोश की यह विशेषता होती है कि उसमें उन सभी शब्दों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है जो कभी किसी जमाने में प्रचलित थे किन्तु वर्तमान में चलन से बाहर हो गए हैं.
बताइए जितना इन्द्र शब्द प्रचलित है क्या "मघवा", "पाकरिपु" आदि शब्द उतना ही प्रचलित हैं?
क्या धनुष शब्द जितना प्रचलित है क्या उतना कारमुक या चाप शब्द है जो धनुष के पर्याय हैं? जितना तरकस शब्द से हम अवगत हैं क्या उतना हीं "निषंग" शब्द हमारे लिए जाना पहचाना है? "स्वर्ग" शब्द जितना प्रचलित है क्या "नाकपृष्ठ" शब्द भी उतना ही प्रचलित है?
क्या "निसेनी" शब्द से अधिकांश लोग परिचित हैं जिसका अर्थ "सीढ़ी" है?
वास्तव में ये चलन से बाहर हुए शब्द हैं जो कभी साहित्यकार प्रयोग में लाते थे.
तो पढ़ने के क्रम में जब अप्रचलित शब्द हमारे सामने आ खड़े होते हैं तो शब्दकोश हीं वह साधन है जो हमें उसके अर्थ से अवगत कराता है.
इसलिए शब्दकोश भी अर्थ प्रतीति का साधन है.
मैंने यथाशक्य सरलतापूर्वक शब्दों के अर्थ ग्रहण के साधनों को निरूपित करने का प्रयास किया है. इसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में निर्णय लेना पाठक के क्षेत्राधिकार में आता है.
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राजीव रंजन प्रभाकर.
०६.०९.२०२२.
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