एकादशी-व्रत की लोकमान्यता

अभ्यंतर शौच के लिए यह आवश्यक है कि समय समय हम अपने चित्त की मलिनता, चंचलता को दूर करें।ठीक उसी प्रकार जैसे हम रसोई में प्रयुक्त पात्रों को हम बाहर से तो साफ करते हीं हैं, भीतर से भी उसकी सफाई मनोयोग से करना आवश्यक हो जाता है ताकि बर्तन के भीतर भी गंदगी न रहे।अनुभव यही कहता है कि बर्तन की अंदरूनी सफाई का महत्व अधिक है। बाहर साफ रहते हुए यदि बर्तन की भीतरी गंदगी बरकरार रहे तो ऐसी सफाई का कोई महत्व उपयोग की दृष्टि से नहीं रह जाता। हां, बर्तन की ऐसे बाहरी सफाई से दूसरे को कुछ देर के लिए भ्रमित या आकर्षित जरूर किया जा सकता है किन्तु इसका परिणाम अंततः उपहास हीं है। देखा जाय तो हमारा शरीर भी तो एक बर्तन ही है। हमारा क्रोध, अहंकार, तृष्णा, ईर्ष्या, द्वेष, अमर्ष, घृणा, भोगाकर्षण-भोगासक्ति के वशीभूत अनिष्ट चिंतन भीतरी गंदगी के रुप में हमारे शरीररुपी वर्तन में व्याप्त है। इसी भीतरी गंदगी की सफाई को शास्त्र में अभ्यंतर शौच कहा गया है।
अभ्यंतर शौच के साधन के रूप में व्रत एवं उपवास की उपयोगिता निर्विवाद है। सनातन हिन्दू धर्म में व्रत एवं उपवास का बड़ा हीं महत्व है। ये दोनों साधनों का आश्रय आत्मोन्नति के द्वार को खोलता है।
इसी क्रम में एकादशी व्रत के सन्दर्भ में कुछ निवेदित किया जाता है। एकादशी तिथि भगवान् विष्णु के लिए अत्यन्त प्रिय है। हिन्दू धर्मावलंबी में एकादशी व्रत के प्रति अपार श्रद्धा और विश्वास है। सामान्यतः एकादशी- व्रत को व्रतों में सर्वोपरि कहा गया है। जैसे नदियों में गंगा, प्रकाशक तत्वों में सूर्य, देवताओं में भगवान् विष्णु की प्रधानता है, वैसे ही व्रतों में एकादशी व्रत की प्रधानता है।तीर्थ, दान और नियम तभी तक अपने महत्व की गर्जना करते हैं जब तक कि मनुष्य भगवान् विष्णु के प्रिय दिवस एकादशी को उपवास नहीं करता। ऐसी लोकमान्यता है कि एकादशी व्रत के श्रद्धा-विश्वास एवं विहित रूप से करने पर लौकिक सुख तो प्राप्त होता ही है साथ ही मनुष्य-जीवन का मुख्य उद्देश्य जो 'भगवत्प्राप्ति' है, स्वतः हो जाती है। फिर न कोई प्राप्तव्य शेष रह जाता है न हीं कोई अभीष्ट। संसार में जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति भोगों की ओर रहती है।इस तिथि को सभी कार्य करते हुए कम से कम यदि हम सम्पूर्ण भोगों से विरत होकर सात्विक भाव को अपनाकर भगवच्चिंतन में संलग्न होते हैं तो इसी से एकादशी व्रत वास्तविकता में सम्पन्न हो जाता है।श्रद्धालु इस तिथि को अन्न-ग्रहण नहीं करते। कहा गया है 'एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरूभयोरपि।' अन्न ग्रहण के स्थान पर श्रद्धा और भक्ति के अनुसार जो निम्नलिखित में सम्भव हो, करना चाहिए-
१. निर्जल व्रत, २.उपवास व्रत, ३.केवल एकबार अन्नरहित दुग्धादि पेय पदार्थ का ग्रहण, ४.नक्त व्रत(दिनभर उपवास रखकर रात्रि में फलाहार करना) ५. एकभुक्त - व्रत(किसी भी समय एकबार फलाहार करना। अशक्त, वृद्ध, बालक और रोगी को भी जो व्रत न कर सकें, यथासम्भव अन्न आहार का परित्याग तो करना ही चाहिए।
रात्रिजागरण और भगवच्चिंतन से द्वादशी तिथि को पारण से व्रत का समापन यथाशक्ति दान से किया जाता है।
एकादशी देवी का प्रादुर्भाव मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष में हुआ है। इसी से इस तिथि की एकादशी उत्पन्ना एकादशी कहलाती है। पद्मपुराण के आधार पर एकादशी व्रत के आरम्भ की एक कथा है जिसके अनुसार जब देवपीड़क मुर नामक परम पराक्रमी राक्षस से परास्त देवराज इन्द्र ने भगवान् विष्णु से इस आततायी से त्राण दिलाने हेतु जब आर्त होकर प्रार्थना की तो दयानिधि भगवान् तुरत ही शेषशय्या को त्याग मुर का वध करने उसके पीछे दौड़े। राक्षस बेतहाशा भागा और तब तक भागता रहा जब भगवान् ने उसका पीछा करना छोड़ दिया।भगवान् मधुसूदन अब उसका पीछा करना छोड़ बदरिकाश्रम चले आये और सिंहावती नामक गुफा में विश्राम करने के क्रम में निद्रा को जब प्राप्त हो गये तो मायावी मुर उस गुफा में भगवान् को मारने की नियत से पहुंचा और जैसे हीं उसने सोये हुए भगवान् पर प्रहार करना चाहा भगवान् के शरीर से एक परम तेजस्वी कन्या प्रकट हुई जिसके एक हुंकार मात्र से दानव मुर भस्मीभूत हो गया। भगवान् जगे, उन्होंने दानव को धरती पर पड़ा देख पूछा- मेरा यह शत्रु अत्यंत उग्र और भयंकर था, किसने इसका वध किया?
कन्या बोली-स्वामिन! आपके हीं प्रसाद से मैने इस महादैत्य का वध किया है।
वह कन्या साक्षात एकादशी थी।भगवान् कन्या पर प्रसन्न हुए। उसने कहा, प्रभो! मुझे यह वर दीजिए कि जो लोग आपमें भक्ति रखते हुए मेरे दिन को उपवास करेंगे उन्हें सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो जाय और वे धन, धर्म और मोक्ष के अनायास ही अधिकारी हो जायें।' भगवान् ने कहा,' कल्याणी ऐसा हीं होगा।'
यही संक्षेप में एकादशी की कथा है, विशेषकर उत्पन्ना एकादशी की। पद्मपुराण के आधार पर २६ एकादशी की अलग अलग कथावस्तु है जिसका स्थानसंकोच उल्लेख की अनुमति नहीं देता।
एक उल्लेखनीय यह भी है कि उस तिथि की एकादशी का पुण्यसंचय और पापक्षय के दृष्टिकोण से कोई जबाब नहीं जिस तिथि को उदयकाल में थोड़ी सी एकादशी, मध्य में पूरी द्वादशी और अंत में किंचित त्रयोदशी हो। ऐसी एकादशी त्रिस्पृशा एकादशी कहलाती है। यह एकादशी भगवान् को बहुत प्रिय है। यदि एक त्रिस्पृशा एकादशी को उपवास कर लिया जाय तो एक सहस्र एकादशीव्रतों का फल प्राप्त होता है।
एकादशी व्रत के समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है।
शेष भगवत्कृपा।
राजीव रंजन प्रभाकर
१२.०७.२०१९
आषाढ़, शुक्लपक्ष एकादशी
(हरिशयनी एकादशी)

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