तुलसी जयंती (श्रावण शुक्ल सप्तमी)
तुलसी जयंती (श्रावण शुक्ल सप्तमी)
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आज श्रावण शुक्ल सप्तमी तिथि है. इसी तिथि को कलि काल के बाल्मीकि कहलाने वाले भक्तमाल के सुमेरू संत शिरोमणि कविकुल तिलक तुलसीदास जी का जन्म संवत १५५४ में हुआ था.
आज प्रायः सभी इस तिथि को भूल चुके हैं. मुझे स्मरण होता है कि इस तिथि के आने के कई दिन पूर्व से हीं मेरे जैसे सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले छात्रों को इस अवसर पर भाषण प्रतियोगिता या रामचरितमानस का पाठ- गायन अथवा मानस आधारित नाटक आदि खेलने की तैयारी विद्यालय के शिक्षक अति उत्साह से करवाते थे.
प्राइवेट या अंग्रेजी स्कूलों की बात तो छोड़ हीं दिया जाय अब मुझे नहीं लगता कि कोई सरकारी विद्यालय में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते होंगे.
मुझे आज भी याद है कि कैसे मेरे एक सहपाठी ने तुलसी जयंती पर आयोजित भाषण प्रतियोगिता में फर्स्ट प्राइज जीता था जबकि तैयारी उसकी मैंने भी कोई कम नहीं कर रखी थी. लेकिन उसकी प्रस्तुति बेहतर थी.
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आज हम अपनी संस्कृति से जुड़ने-जोड़ने का दंभ तो जरूर करते हैं किंतु व्यवहार में हर उन तत्वों की उपेक्षा करते पाए जाते हैं जो हमारे भीतर के सद्गुणों एवं सद्भाव के विकास में सहायक हो.
तुलसी जयंती के अवसर पर आज के हिंदी अखबार में भी तुलसी जयंती की कोई चर्चा नहीं के बराबर देख यही लगा कि सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है. पहले जो अखबार सुरूचियों के संपोषक होते थे आज वह सनसनी के संवाहक बन बैठे हैं.
आज जब कुछ ऐसे मित्रों ने तुलसी जयंती के अवसर पर व्हाट्स एप के माध्यम से शुभकामनाएं भेजी तो मन प्रसन्न हो गया. कुछ वर्ष पूर्व जब मैं गया शहर में पदस्थापित था तो उनके साथ वहां शहर में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में शामिल होने की बात स्मरण हो आयी.
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विज्ञता के नाम पर अज्ञता को प्रदर्शित करने का सबसे सरल प्रमाण यह होगा कि तुलसी को चाहे उच्च कोटि का हीं सही; एक कवि कह के सम्बोधित किया जाय.
तुलसीदास को मात्र एक उच्च कोटि का कवि मानना देव-प्रतिमा निर्माण में प्रयुक्त पाषाण की प्रकृति की विवेचना करने जैसा है.
तुलसी की वाणी को जो लोक में प्रतिष्ठा है वह वेदतुल्य है. आम लोगों की जिह्वा पर आज भी जितना निवास मानस की चौपाई का है उतनी श्रुति की ऋचाओं का नही.
समाज चाहे कितना हीं अपने आदर्शों से पतित हो गया हो आज भी जितनी व्यापकता तुलसीकृत मानस की है वह न तो वेद, न हीं उपनिषद,न हीं भगवद्गीता और न हीं बाल्मीकि रामायण की है.
यह एक तथ्य है जिसे निरपेक्ष भाव से स्वीकारना हीं होगा.
तुलसीकृत "रामचरितमानस" के पठन-पाठन-श्रवण-कीर्त़न-गायनादि मात्र से जो सद्भाव एवं सद्गुणों का सृजन-पोषण एवं विकास होता है वह वाणी का अविषय है.
तुलसीकृत रामचरितमानस एक ऐसा ग्रंथ है जो रामनामरूपी महौषधि से कलियुग में व्याप्त मोह,काम, क्रोध,लोभ,मान,मद,मत्सर, तृष्णा,कपट, दंभ, ममता, ईर्ष्या,हर्ष-विषाद,अहंकाररूपी नाना असाध्य मानस रोगों का उपचार करता है.
सनातन संस्कृति को बचाए रखने में जिस ग्रंथ का आज की तिथि में योगदान सर्वाधिक है वह '"रामचरितमानस" है.
अपने रचनाकाल से हीं "रामचरितमानस" ने जिस लोकप्रियता के साथ लोकसेवा की है उतना शायद हीं किसी कलियुग प्रणीत ग्रंथ द्वारा संभव हो पाया है.
ज्ञान, भक्ति, नीति और वैराग्य का जो समन्वय इस ग्रंथ में ग्रंथित है वह विश्व के किसी अन्य ग्रंथ में दुर्लभ है.
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मुझे तो लगता है कि आने वाले समय में हर उस व्यक्ति/संस्था को कहीं "आधुनिक एवं वैज्ञानिक" सोच आदि के नाम पर फालतू न समझा जाने लगे जिसने हमारे सनातन धर्म, विश्वास, आस्था और संस्कृति को किसी न किसी रूप में सींचा है. यदि ऐसा होगा तो वास्तव में वे दिन हमारी अधोगति को तेजी से सुनिश्चित करेंगे.
न्यूनतम संक्षेप में यदि आज का कोई "आधुनिक" छात्र तुलसी का परिचय जानने की इच्छा रखे तो निम्नलिखित यथेष्ट होगा.
तुलसी सरयूपारीण ब्राह्मण थे.प्रयाग के समीप स्थित राजापुर गांव में तुलसी का जन्म हुआ था. हुलसी तुलसी की माता का नाम था और पिता का नाम आत्माराम राम दूबे. तुलसी का असली नाम क्या था, पता नहीं. शायद उनका नामकरण हीं नहीं हुआ था. जन्म लेने के साथ ही ऐसी मान्यता है कि उन्होंने राम- राम का उच्चारण किया जिस चलते वे रामबोला कहलाए. यह भी कहा जाता है कि जन्म के समय उनके मुंह में बतीसो दांत थे और उनका डील-डौल कोई पांच वर्ष के बालक जैसा था. ऐसे विलक्षण बालक को देख उनकी मां घबरा गई और लोक लज्जा से भयभीत हो उस बालक को अपनी दासी चुनियां के घर भेज दिया और कहते हैं वह स्वयं इस असार संसार से विदा हो गई.
बाद में चुनियां का भी देहांत हो गया. अब तुलसी अनाथ हो गए. अनाथ तुलसी पर माता पार्वती को दया आ गई. वह रोज ब्राह्मणी का वेष धारण कर बालक तुलसी को भोजन कराती थीं.
तुलसी जब थोड़े बड़े हुए तो नरिहरिदास के शरण में चले गए. अपने विद्यागुरु से दीक्षित तुलसी ने अल्पकाल में ही सभी वेद-उपनिषद, पुराणों- रामायण सम्यक अध्ययन कर लिया. बाद में अर्थोपार्जन के लिए कथावाचक बने. तत्पश्चात उन्होंने भारद्वाज गोत्र की एक सुंदरी कन्या रत्नावली से ब्याह कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया किंतु शीघ्र हीं पत्नी के मर्मवचन से आहत तुलसी संन्यासी बन बैठे.
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ऐसी मान्यता है कि संन्यासी तुलसी को भगवान राम ने चित्रकूट के घाट पर बालक रूप में दर्शन दिया. वो तो तुलसी भगवान को पहचान हीं नहीं पाते यदि ऐन वक्त पर हनुमानजी पहचनवाने में मददगार नहीं बनते.
इस संदर्भ में हनुमानजी के नाम से जुड़ी एक बड़ी हीं प्रचलित पंक्ति है-
चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर।
तुलसिदास चंदन घिसें तिलक देत रघुवीर।।
भगवान राम से तिलक लगवाते तुलसी भाव-विभोर हो गए.
संवत् १६३१ में उन्होंने रामचरितमानस की रचना आरंभ की जो संवत् १६३३ को विवाह पंचमी अर्थात् राम-विवाह की तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पंचमी को समाप्त हुआ.
रामचरितमानस के रचना के साथ ही तुलसी इतने प्रसिद्ध हो गए कि काशी के समस्त पंडित उनसे जल उठे. वे नाना प्रकार की अवसरों की तलाश में रहते कि कैसे तुलसी को अपमानित या प्रताड़ित किया जाय.
कभी वे उस रामचरितमानस को चुराने के लिए चोरों को भेजते तो कभी विश्वनाथजी के मंदिर में उनके द्वारा रचित रामचरितमानस को सारे वेद-पुराण़ों, गीता-रामायणादि धर्मग्रंथों के नीचे रखकर वे तुलसी को अपमानित करने का प्रयत्न करते. बाद में सभी को अपनी भूल का अहसास हो गया जब प्रतिदिन मंदिर का पट खुलता तो यही पंडित पाते कि रामचरितमानस सभी ग्रंथों के उपर प्रतिष्ठित है. बंद पट के खुलने पर ऐसा चमत्कार क्यों और कैसे होता यह उनके समझ के परे था. तुलसी को इन बातों से भला क्या मतलब! वे तो जो मिलता उसे खाते और गोर पसार कर सोते. खाने और सोने आदि से जो समय बचता उसे राम-चिंतन में लगाते. उन्हें किसी से कुछ भी लेना-देना था नहीं. न लोकप्रतिष्ठा और न लोकापवाद तुलसी को बदल पाया. ताजिंदगी तुलसी पूरे अक्खड़ के अक्खड़ बने रहे.
कारण साफ था. तुलसी पर विश्वेश की विशेष कृपा थी; बल्कि उनकी प्रेरणा से ही उन्होंने रामचरितमानस को लोकभाषा में रचा था. वरना काशी जैसी नगरी जहां संस्कृत के इतर किसी भाषा को ब्राह्मण या विद्वान कुछ भी स्थान देने को स्वाभाविक रूप से किंचित भी तैयार न हों वह ग्रंथ वेदतुल्य प्रतिष्ठा हासिल कर लें तो यह बिना विश्वेश के आशीर्वाद के संभव है?
काव्य के दृष्टिकोण से भी यह नि: संकोच कहना उचित है कि ऐसा कोई भी काव्यांग नहीं जो रामचरितमानस में साक्षात् मूर्तिमान होकर अवतरित न हुआ हो.
तुलसी की अन्य रचनाएं भी अत्यंत प्रखर एवं प्रवर हैं.
ये हैं कवितावली,दोहावली,विनय-पत्रिका.
संवत् १६८० श्रावण कृष्ण तृतीया को बनारस के असीघाट पर अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर तुलसी साकेतवासी हो गए.
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राजीव रंजन प्रभाकर.
०४.०८.२०२२
तुलसी जयंती.
(श्रावण शुक्ल सप्तमी)
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