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Showing posts from December, 2025

गणेशजी के फुसलेबाक लेल

पार्वती'क होरिल शिव'क दुलरूआ माए'क कोरा सॅं उठू हमर गणेश बौआ कार्तिक के छोटकू मोदक के पेटू विघ्न'क गलघोंटू हमर गणपति बौआ शुभकार्य'क हेतु हमर गजानन बौआ चलू हम अहाॅं के मोदक देब यौ गणेश बौआ                    ***       [होरिल-कोरा'क लेधूरिया बालक जे अखन तैक माए'क दूध पिबैत हो       लेधूरिया- धूरा-माइट में लेटाइ वला बच्चा        माए'क कोरा- माॅं के गोदी        मोदक- लड्डू ]                        (स्वरचित)            ~राजीव रंजन प्रभाकर

मैथिली भाषा'क किछु मौलिक शब्द पर चर्चा

गाम से एक गोटे आयल छला. हमर बेटी हुनका पैर छूबि प्रणाम केलक.  ओ आशीर्वाद दैत कहलैन- नीके रहू. ओ अभ्यागत हमरा से पूछलैन-इ अपने’क कनकिरबी थिक? हम कहलिए-हॅं ओ-वाह, बड्ड नीक. जखन ओ गेलैथ तऽ हमर बेटी हमरा सॅं पूछलक-पापा ‘कनकिरबी’ मतलब बेटी होता है?  हम- हाॅं,और कनकिरबा का अर्थ बेटा. बेटी- मैं अनुमान से समझ गई थी. यद्यपि हमर बेटी’के मैथिली बाजै लै आबै छै. किंतु सामान्य बोलचाल में एहि तरह शब्द’क प्रयोग हमहूॅं तऽ बुझू नहिए करैत छी ते ओ कोना बुझैत.अस्तु ********************************************** आय काल्हि जे मैथिली बजनिहार छैथ सेहो मैथिली भाषा केर बहुत रास शब्द सॅं जेना अनभिज्ञे बुझू. एकर अनुभव यदा-कदा हमरा होयत रहैत अछि. आब मैथिल सब जे छैथ उहो मैथिली बाजैत काल में ‘जलखै’ के ब्रेकफास्ट/नाश्ता बजै छैथ तथा ‘भानस’ के रसोई. तहिना ‘भंसाघर’ आजुक दिन में ‘किचन’ कहि सम्बोधित होयत अछि.  एहि तरहे बहुत रास मैथिली भाषा केर मूल शब्द मैथिलियो भाषा’क बोली-चाली में प्रयोग उत्तरोत्तर कम होयत जा रहल अछि. कथा साहित्य में ध्यान देला पर कत‌उ-कत‌उ अवश्य भेंट भऽ सकैछ किंतु बोली चाली में तऽ नहिए’क ब...

नारायणस्मरणस्त्रोत

नारायणस्मरणस्त्रोत. *************************** १.नारायण पादपंकजम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। २.लोक वेद रक्षकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ३.चित्तशुद्धि कारकम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌ ४.संसारतापशमनकारणम्। नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ५.सुखसमृद्धिकारकम्।  नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ६.हरस्वामीसखासेवकम्।   नमाम्यहम् नमाम्यहम्।। ७.रामरामेतिमंत्रमुच्चरण्। कदा सुखी भवाम्यहम्।।          नारायण पादपंकजम्।          नमाम्यहम् नमाम्यहम्।‌।                      (स्वरचित)              ~राजीव रंजन प्रभाकर *** १.श्रीमन्नारायण के पदकमल को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. २.लोक और वेद के रक्षक को  मैं प्रणाम करता हूॅं, में प्रणाम करता हूॅं. ३.चित् के शुद्धिकर्ता को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ४.संसार-ताप के शमनकारण को  मैं प्रणाम करता हूॅं, मैं प्रणाम करता हूॅं. ५.सुखसमृद्धि के कारक को  मैं प्रणाम करता हूॅं,मैं प्रणाम करता ...

जो ला न सको छ: तुम तो

जो ला न सको छ: तो अपनों की गोटी हीं काटो मौका़' देखकर जैसे भी हो अपनी गोटी लाल करो                   ** अच्छी-अच्छी बातें कह वा'इज़ कहलाना मक़सूद है सबके सर में यही है सौदा यही अब वाहिद फ़तूर है                     ** कौ़ल और फे'ल में फ़र्क़ अब चौंकाने वाली बात नहीं  अगर एक सा हो मा'लूम तो फिर सहसा हो विश्वास नहीं.               ~राजीव रंजन प्रभाकर  वा'इज़-उपदेशक मक़्सूद-उद्देश्य सर-दिमाग़ सौदा-दीवानगी नुमायाॅं-प्रत्यक्ष फ़तूर- बेचैनी, खोट ख़राबी क़ौल-कथनी फ़ै'ल-करनी फ़र्क़-अंतर جو لا نہ سکو چھہ تو اپنوں کی گوٹی ہیں کاٹو موقع دیکھ کر جیسے بھی ہو اپنی گوٹی لال کرو ** اچھی-اچھی باتیں کہکر واعظ کہلانا مقصود ہے  سب کے سر میں یہی ہے سودا یہی اب نمایاں فتور ہے۔ ** قول اور فعل میں فرق اب چونکانے والی بات نہیں  اگر ایک سا ہو معلوم تو پھر سہسہ ہو وشواس نہیں۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

कभी इसके दर कभी उसके दर

कभी इसके दर कभी उसके दर यूॅं हीं दर-ब-दर जो भटकता पहुॅंचा तेरे दर देखकर तेरा अपनापन  पाकर तेरी मुहब्बत और  नज़रों में मेरा इंतज़ार  मुझे यकीं हुआ कि इस दहर में   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर   है यही मेरा घर.             ~राजीव रंजन प्रभाकर (दर=चौखट) (दहर=संसार) کبھی اس کے در کبھی اس کے در یوں ہیں در بہ در  جو بھٹکتا پہونچا تیرے در دیکھ کر تیرا اپناپن پاکر تیری محبت اور  نظروں میں میرا انتظار  مجھے یقیں ہوا کہ اس دہر میں  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر  ہے یہی میرا گھر ۔ ~بصد احترام  راجیو رنجن پربھاکر

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं

भाय कुभाय अनख आलसहूॅं  ************************************** संसार में प्रायः सभी लोग ईश्वर का नामोच्चार या नाम स्मरण अनिष्ट के निवारण वा अभीष्ट की प्राप्ति के लिए हीं करते हैं.  इसके अतिरिक्त मोहमुक्त एवं नामनिष्ठ संत श्रद्धावश अपने तत्व जिज्ञासा के समाधान हेतु अथवा अपने तत्व ज्ञान के संरक्षण हेतु भी ईश्वर का नाम लेते हैं.                            *** इस प्रकार  ईश्वर का नाम लोग                   या तो भयवश                  या लोभवश                   या श्रद्धावश  लेते हैं. लेकिन ईश्वर का नाम किसी को क्रोधवश लेते नहीं सुना है.देवर्षि नारदजी अपवाद हैं. कारण साफ है कोई अपने से बलवान या सामर्थ्यवान पर क्रोध नहीं कर सकता है; यह अनुभव सिद्ध तथ्य है.        हाॅं;ईश्वर को कोसते हुए हमने जरूर सुना हैं. क्षोभ और स्तोभ दोनों में ईश्वर का नाम ...