जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, उपरोक्त का आशय चार साधनों के समूह से है. ये कौन से साधन हैं जो मनुष्य को बन्धन से मुक्त करते हैं-इसे आचार्य शंकर ने स्वरचित ग्रंथ 'विवेक-चूड़ामणि' मे...
जीवनपर्यंत हम कुछ न कुछ करते हीं रहते हैं. यह भी सच है कि कुछ किये बिना रह भी नहीं सकते. प्राणयात्रा से लेकर शारीरिक यात्रा भी बिना कर्म किये असम्भव है. कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि स्वार्थ से लेकर परमार्थ तक हमारी सारी गतिविधियां प्रायः स्वयं को केन्द्र में रखकर ही होती है. किन्तु ईश्वर को हमारे इन कर्मों से कोई मतलब नहीं है. उनको यदि सरोकार है तो हमारी उन क्रियाओं के पीछे छुपे भाव से. वे ये भी नहीं देखते कि उन्हें भजने वाला मूरख है या विद्वान. वे तो केवल प्रेम देखते हैं, भावना देखते हैं,समर्पण देखते हैं. तभी एक श्लोक है कि व्याकरणज्ञान से रहित कोई मूर्ख शुद्धश्रद्धाभावेन 'विष्णवे नमः' के बदले 'विष्णाय नमः' का भी पाठ करे तो फल की दृष्टि से कोई अंतर नहीं होगा; कारण भगवान् क्रियाग्राही हैं ही नहीं, वे तो भावग्राही ठहरे. मूर्खो वदति विष्णाय धीरो वदति विष्णवे। तयोः फलं तुल्यं हि भावग्राही जनार्दनः।। वे तो इतने भावग्राही हैं कि प्रेमपूर्वक अर्पित पत्र, पुष्प, फल वा जल को खा तक लेते है. इसे देखने का न तो हममें सामर्थ्य है न हीं सारग्राहिणी-सूक्ष्मदर्शिणी बुद्धि. पत्...
उपर्युक्त शीषर्क श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम अध्याय का ६६वां श्लोकांश है जो पूर्ण में निम्नवत है - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। प्रायः उपरोक्त श्लोक की विवेचना सत्संग में जहां भगवान् और भक्त के सम्बंध में चर्चा हो रही होती है, की जाती है। भगवान् युद्धभूमि में भी मोह और विषाद से दग्ध अर्जुन को सब कुछ बता चुके थे।वे आत्मा की अमरता, शरीर की नश्वरता, कर्मबंधन से छुटकारा हेतु कर्तव्यकर्म की अनिवार्यता, ज्ञान, कर्म, भक्ति, त्याग तथा सन्यासादि विषयक तत्वों पर व्यापक रूप से प्रकाश डाल चुके थे। यहां तक कि अपनी विभूतियों के विषय में भी सोदाहरण बताने के तदनन्तर अपना विराट रूप सहित चतुर्भुज रूप से भी अर्जुन को दर्शन करा चुके थे भगवान्। अनेक प्रकार से समझाने पर भी अंत में सारांशरूपेण उन्होंने अर्जुन से यही कहा कि तुम सभी आश्रय को छोड़ एकमात्र मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा। कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। न हीं क्या कर्म है, क्या अकर्म है क्या विकर्म है इत्यादि जो तत्वज्ञ तक को मोहित करनेवाले हैं, पर जरूरत से...
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