संत की बात

जो संत है वह पंथ की बात नहीं करेगा.
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* वह करेगा बात सत्य की,श्रद्धा की,विश्वास की,त्याग की,क्षमा की, प्रेम की,करूणा की,दया की,अक्रोध, सहिष्णुता की; जिसे हीं समेकित रूप में धर्म कहा गया है. 

* वह उस धर्म की बात करेगा जो विवाद एवं बहस पर क़ायम न होकर श्रद्धा,विश्वास एवं आस्था पर कायम है न कि चमत्कार पर या फिर तर्क़, विश्लेषण या वैज्ञानिक परीक्षण पर हीं.
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 गोस्वामीजी रामचरितमानस में कहते हैं-
संत हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।
निज परिताप द्रव‌इ नवनीता ।
पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।

(भावार्थ-संतो का हृदय मक्खन के समान होता है, ऐसा कवियों ने कहा है; परन्तु उन्होंने असली बात कहना नहीं जाना; क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने से पिघलाता है लेकिन परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से स्वयं हीं पिघल जाते हैं.)
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आश्चर्य नहीं कि किसी गृहस्थ में हीं आपको संत चरित्र के दर्शन हो जाएं.
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                                           ~R.R.Prabhakar.
                                                  १०.०६.२०२३

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