आत्मज्ञान का पंख-एक रूपक

*आत्मज्ञान का पंख*

मनुष्य को एक पंख उग आया - विज्ञान का पंख. उसने जोर लगाया और आकाश में उड़ गया. उसके आश्चर्य की सीमा न रही. सभी के पंख हो जाने से सभी को स्वयं के  महामानव-महाशक्ति होने का अह्सास-अहंकार ने अपने मोहपाश में बांध लिया.
परिणाम; अब वह मुक्त और शांत नहीं था. चारों ओर से उसे जटिलता की आंधियों ने सताना प्रारंभ कर दिया.
मनुष्य बहुत घबराया. प्रार्थना की कि" हे प्रभो! कैसे संकट में डाल दिया? इससे तो अच्छा था कि हमें जन्म हीं न देते."
आकाश को चीरती काल-पुरुष की आवाज आयी-"वत्स! आत्मज्ञान का एक पंख और उगा. भीतरवाली चेतना का भी विकास कर. वही संतुलन पैदा कर सकेगी.
यदि तू ऐसा न कर सका तो उस एक विज्ञानरुपी पंख की सहायता से बहुत देर उड़ न सकेगा और शीघ्र ही आपस में टकराकर-छटपटाकर नीचे गिर अपने अस्तित्व को हीं खो बैठेगा."
             
राजीव रंजन प्रभाकर.
०४.०८.२०२०..

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